लघुकथा चिंता
हाड कंपाती ठंड थी और राजेंद्र जी अपनी इकलौती बहू से पूंछ रहे थे ” समता, कल तुम राजबाडा गई थी, तुमसे तीन चार कम्बल लाने को कहा था, ले आई क्या ? “
नही पापा, मैं जल्दी जल्दी में भूल गयी, अब अगले हफ्ते जाऊंगी तब ले आऊंगी, यह कहकर समता अपने कमरे में चली गई। शाम को काम से वापस लौटने पर उसने यह बात अपने देवरो शैलू और रिंकी से कही कि आज पापाजी नये कम्बल मंगाने का बोल रहे थे जबकि कड़कड़ाती ठंड और पापा की तबीयत देखते हुए मैने पिछले सप्ताह ही उनके सारे गर्म कपड़े, टोपे, ऊनी मोजे और उनकी पसंद की गर्म रजाईया निकाल कर रख दी थी ताकि पापा जी को ठंड का बिल्कुल भी अहसास न हो।
” देखते हैं भाभी “, डब्बू भैया भी कल जबलपुर से वापस आ जायेंगे और कल रविवार भी है तो अच्छे से चर्चा भी कर लेंगे, कहकर दोनो देवर भी सोने के लिए अपने अपने कमरें में चले गए। उधर वृद्ध राजेंद्र जी अपने गर्म कम्बल में भी करवट बदल बदल कर सुबह होने का इंतजार कर रहे थे और सोच रहे थे कि कल सुबह मैं ही आटो से जाकर खुद ही कम्बल ले आऊंगा। सुबह होने को आई, चिड़ियों की चहचहाहट से राजेंद्र जी की नींद खुली और नित्य किर्याओ से निवृत्त होकर नाश्ता करके वे राजबाडा जाने की तैयारी करने लगे, तभी बड़े बेटे डब्बू, जो कुछ देर पहले जबलपुर से लौटा था, पिताजी को कहीं जाने को तैयार देख पूंछ बैठा कि पापा सुबह सुबह कहां जा रहे हैं ? बड़े बेटे की बात सुनकर बोले कि कल बहू समता राजबाडा गई थी तो मैने उससे तीन चार कम्बल मंगाये थे लेकिन वह लाना भूल गई तो मैने सोचा कि मैं ही खुद जाकर ले आता हूं, तब तक राजेंद्र जी के दोनो बेटे शैलू और रिंकी भी अपने अपने कमरे से उठकर आ गए और उन्होने भी पूंछा कि पापा सुबह सुबह कहां जा रहे हो, कल ही भाभी बता रही थी कि आपको तीन चार कम्बल चाहिए हैं जबकि समता भाभी ने तो ठंड की तीव्रता और आपकी तबियत को देखकर दो दिन पहले ही आपके सारे गर्म कपड़े, आपकी जयपुरी रजाई और कम्बल निकाल दिये ताकि आपको रात में परेशानी न हो, आपको ठंड न लगे।
ठंडी सांस भरकर राजेंद्र जी बोले बेटों, समता ने तो अपना काम पूरी जिम्मेदारी से और ठंड आने के पहले कर दिया है लेकिन पदमावती कालोनी के अपने इस बंगले के सामने वाले दोनो प्लाटों पर जो मकान बन रहें है ना, उनके मजदूरों के मासूम बच्चे रातभर कड़ी ठंड में ठिठुरते रहते हैं और रोते रहते है। इनका ठिठुरना मुझसे देखा नही जाता और अच्छे से अच्छे कम्बल में भी मुझे रातभर नींद नही आती है, इसलिए मैं इनके लिए कम्बल लेने जा रहा था। सारा परिवार निःस्तब्ध था पापा जी की चिंता को देखकर। तब पापा जी ने उस खामोशी को तोड़ते हुए बताया कि कैसे उनके स्वर्गस्थ दादा मूलचंद जी जो सतना में कपड़े के बहुत बड़े व्यापारी थे और कंपकंपाती ठंड में कई बार जैन मंदिर के बाहर बैठे ऐसे गरीबों को ठंड से बचने के लिए अपनी कीमती शाॅल दे आया करते थे और उसी से मुझे यह प्रेरणा मिली।
✍???? डाक्टर संदीप नारद 260 AA, तुलसी नगर, इंदौर मध्यप्रदेश
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