सूचना का अधिकार बना कागज़ी—प्रथम अपील के बाद भी नहीं हुई सुनवाई, आवेदक परेशान

सूचना का अधिकार बना कागज़ी—प्रथम अपील के बाद भी नहीं हुई सुनवाई, आवेदक परेशान

संवाददाता ताम्रध्वज साहू

बेमेतरा:-सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 को आम नागरिकों को पारदर्शिता और जवाबदेही दिलाने का सबसे मजबूत कानून माना जाता है, लेकिन बेमेतरा जिले में इसका क्रियान्वयन सवालों के घेरे में आ गया है। ताजा मामला वार्ड क्रमांक 15, नयापारा निवासी ताम्रध्वज साहू का है, जिन्होंने ग्राम पंचायत स्तर पर जानकारी प्राप्त करने के लिए आवेदन किया, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी न तो जानकारी दी गई और न ही अपील पर सुनवाई की गई। मिली जानकारी के अनुसार, आवेदक ने दिनांक 16 सितंबर 2025 को ग्राम पंचायत के जन सूचना अधिकारी के समक्ष RTI आवेदन प्रस्तुत किया था। इस आवेदन के माध्यम से उन्होंने पंचायत से संबंधित आवश्यक जानकारी मांगी थी। कानून के अनुसार, जन सूचना अधिकारी को 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी आवेदक को कोई जवाब नहीं मिला। जब आवेदक को जानकारी नहीं मिली, तो उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अगला कदम उठाते हुए 6 नवंबर 2025 को प्रथम अपील अधिकारी, जनपद पंचायत बेमेतरा के समक्ष अपील दायर की। आमतौर पर प्रथम अपील अधिकारी को 30 से 45 दिनों के भीतर सुनवाई कर आदेश पारित करना होता है, लेकिन इस मामले में यह प्रक्रिया भी ठप नजर आ रही है। आवेदक का आरोप है कि आज तक न तो उन्हें सुनवाई के लिए बुलाया गया और न ही कोई लिखित आदेश दिया गया। ताम्रध्वज साहू का कहना है कि उन्होंने पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए विधिवत आवेदन और अपील दायर की, फिर भी प्रशासन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है। उन्होंने बताया कि RTI के माध्यम से मांगी गई जानकारी उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता के कारण उन्हें बार-बार चक्कर काटने पड़ रहे हैं। इस मामले ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। RTI अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना और नागरिकों को सशक्त बनाना है, लेकिन जब अधिकारी ही इस कानून की अनदेखी करें, तो आम लोगों का भरोसा कमजोर होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली को दर्शाता है। उनका कहना है कि अगर समय पर जानकारी नहीं दी जाती और अपीलों पर सुनवाई नहीं होती, तो RTI जैसे महत्वपूर्ण कानून का कोई अर्थ नहीं रह जाता।गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत यदि कोई जन सूचना अधिकारी निर्धारित समय सीमा में जानकारी देने में विफल रहता है, तो उस पर प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा प्रथम अपील अधिकारी का दायित्व होता है कि वह समय पर सुनवाई कर उचित आदेश पारित करे, लेकिन इस मामले में दोनों स्तरों पर लापरवाही सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब आवेदक ने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर ली है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द ही कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वह द्वितीय अपील दाखिल करेंगे और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करेंगे। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती हैं और पारदर्शिता के दावे खोखले साबित होते हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और आवेदक को जल्द से जल्द जानकारी उपलब्ध कराई जाए। अंततः यह मामला यह दर्शाता है कि कानून होने के बावजूद यदि उसका सही तरीके से पालन नहीं किया जाए, तो आम नागरिकों को न्याय पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या वास्तव में RTI अधिनियम के उद्देश्यों को जमीन पर उतारा जाता है या नहीं।

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