शौर्यगाथा : 12 जुलाई फतेहपुर कभी नहीं भूलेगा !
1857 की क्रांति में फतेहपुर का अमर बलिदान
संवाददाता बृजेंद्र मौर्य फतेहपुर । 1857 का वर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला लेकर आया। 11 जून 1857 को फतेहपुर की धरती पर स्वतंत्रता का परचम लहराया। ठाकुर सुजान सिंह, डिप्टी कलेक्टर हिकमतउल्ला, बाबा गया दीन दुबे, महाराज सिंह और जोधा सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती दी। इलाहाबाद से कानपुर तक का क्षेत्र क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गया। नाना साहब की हुंकार और स्वतंत्रता सेनानियों का जोश फतेहपुर को आजादी की गढ़ में बदल चुका था। लेकिन अंग्रेजों की नजर इस रणभूमि पर थी। कर्नल नील ने इलाहाबाद पर पुनः कब्जा किया, और फतेहपुर जीटी रोड का द्वार बन गया, जहां से कानपुर और दिल्ली तक अंग्रेजी फौजें बढ़ सकें।
ठाकुर दरियाव सिंह ने जमींदारों और तालुकदारों को संगठित कर नारा दिया – “इस धरती को बचाओ!”5 जुलाई 1857 को कटोघन में मेजर रिनार्ड की ब्रिटिश टुकड़ी पहुंची, जिसका मुकाबला करने नाना साहब ने हुलास सिंह को तोपखाने, पैदल सेना और घुड़सवारों के साथ भेजा। 11 जुलाई को गाजियाबाद में ठाकुर सुजान सिंह ने रिनार्ड की सेना को करारी शिकस्त दी। लेकिन रात के अंधेरे में अंग्रेजों ने पुनः हमला कर खागा में लूटपाट, आगजनी और नरसंहार मचाया।
बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों को बेरहमी से मौत के घाट उतारा गया। खागा का गांव श्मशान में बदल गया। इसी बीच, मेजर जनरल हैवलॉक अपनी सेना लेकर बिलंदा पहुंचा। गद्दार मनु लाल खत्री और मीर मुंशी आबिद अली ने क्रांतिकारियों की रणनीति अंग्रेजों तक पहुंचा दी। 12 जुलाई 1857 की सुबह, बिलंदा की धरती पर निर्णायक युद्ध छिड़ा। पुरानी बंदूकों और सीमित संसाधनों के बावजूद क्रांतिकारियों ने डटकर मुकाबला किया। लेकिन गोलाबारूद और संसाधनों की कमी के आगे साहस भी कम पड़ गया।
150 वीर सपूत बलिदान हो गए, और स्वतंत्रता की इस जंग में फतेहपुर ने भारी कीमत चुकाई। अंग्रेजी हुकूमत ने फतेहपुर में तबाही मचाई। शहर को लूटा, आग लगाई, हत्याकांड किया। डिप्टी कलेक्टर हिकमतुल्लाह को पकड़कर फांसी दी गई, और उनका सिर कोतवाली पर लटका दिया गया। अंग्रेजों की बर्बरता की कहानी सुनकर आज भी लोगो की आंखों में आंसू आ जाते हैं।
31 दिनों तक फतेहपुर स्वतंत्र रहा, लेकिन इसके बाद भी हार नहीं मानी। 1859 तक गोरिल्ला युद्ध चलता रहा और फतेहपुर क्रांति का प्रतीक बना रहा। आज भी फतेहपुर की फिजाओं में उन वीरों की शौर्यगाथा गूंजती है जिन्होंने अपने खून से आजादी की इबारत लिखी। यह केवल कहानी नहीं, बल्कि चेतावनी है कि स्वतंत्रता अमूल्य है, और इसके लिए हर कुर्बानी स्वीकार है।
ये भी पढ़ें प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या — तीन बच्चों की मां बीना ने रची खौफनाक साजिश













