अखंड सौभाग्य का पर्व करवा चौथ कल: सोलह श्रृंगार कर सुहागिनें पतियों की लंबी उम्र के लिए रखेंगी निर्जला व्रत
ऊँचाहार संवाददाता धीरेंद्र कुमार
रायबरेली ऊँचाहार भारतीय संस्कृति में सुहागिनों के सबसे बड़े और पवित्र पर्व ‘करवा चौथ’ को लेकर देशभर में उत्साह और उल्लास का माहौल है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाए जाने वाले इस महापर्व पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इस बार यह पर्व महिलाओं के जीवन में विशेष उल्लास लेकर आया है, जिसे लेकर बाजारों से लेकर घरों तक में खास तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
सोलह श्रृंगार और सज-धज कर तैयार होती हैं महिलाएं
करवा चौथ का दिन हर सुहागिन के लिए बेहद खास होता है। इस दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करती हैं और पूरे दिन बिना अन्न-जल के रहती हैं। शाम के समय माता करवा, भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस अवसर पर महिलाएं नया परिधान पहनकर, हाथों में मेहंदी सजाकर और सोलह श्रृंगार कर सजती-संवरती हैं। पूजा के दौरान करवा चौथ की पारंपरिक कथा सुनने का भी विशेष विधान है, जो इस व्रत के धार्मिक महत्व को और गहरा करता है।
व्रत से जुड़ी प्रचलित कथाएं और मान्यताएं
करवा चौथ के व्रत के पीछे कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं जुड़ी हैं। सबसे लोकप्रिय कथा रानी वीरावती की है, जिसके सातों भाइयों ने अपनी बहन का व्रत खुलवाने के लिए छल से पीपल के आड़ में चलनी के पीछे दीपक जलाकर कृत्रिम चांद दिखा दिया था। इसके प्रभाव से राजा की सेहत खराब होने लगी, जिसके बाद वीरावती ने विधिपूर्वक पुन: व्रत कर अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। इसके अलावा, महाभारत काल में द्रौपदी द्वारा पांडवों की रक्षा के लिए इस व्रत को रखने का प्रसंग भी काफी प्रसिद्ध है।
चांद के दीदार के साथ संपन्न होता है उपवास
पूरे दिन कठिन उपवास रखने के बाद महिलाओं की निगाहें आसमान पर टिकी रहती हैं। चंद्रोदय के पश्चात छलनी से चंद्रमा को और फिर अपने पति का चेहरा देखकर महिलाएं जल ग्रहण कर अपना व्रत तोड़ती हैं। यह पल पति-पत्नी के रिश्ते में प्रगाढ़ता और विश्वास को और मजबूत करता है। संपूर्ण भारत में मनाए जाने वाले इस पर्व पर चारों ओर उल्लास और उत्सव का अनूठा रंग देखने को मिलता है।











