अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त निर्दोश को जेल भेजने वाले अधिकारियों से होगी वसूली, व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि
स्टेट ब्यूरो चीफ़ विष्णु रावत
प्रयागराज/लखनऊ, 9 जून 2026। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संविधान का मूल अधिकार बताते हुए अवैध हिरासत और पुलिस की मनमानी पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को बिना वैधानिक आधार के 24 घंटे से अधिक पुलिस हिरासत में रखना कानून और संविधान के विरुद्ध है। अदालत ने ऐसे मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने तथा दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि यदि किसी नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है तो राज्य सरकार को उसे मुआवजा देना होगा। अदालत ने एक मामले में 24 घंटे की अवैध हिरासत पर ₹25,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि पुलिस अधिकारियों को यह नहीं समझना चाहिए कि उनके द्वारा किए गए अधिकारों के उल्लंघन पर कोई सवाल नहीं उठेगा। संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य और पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है।
फैसले के अनुसार, अवैध हिरासत के मामलों में दिए जाने वाले मुआवजे की राशि संबंधित दोषी अधिकारियों से भी वसूली जा सकती है। अदालत ने पहले से लागू राज्य सरकार की उस नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी जोर दिया है, जिसमें अवैध हिरासत के शिकार नागरिकों को क्षतिपूर्ति देने का प्रावधान है।
हाईकोर्ट ने मामले में पुलिस प्रशासन को आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं। साथ ही, प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को 14 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया है।
इस ऐतिहासिक फैसले को उत्तर प्रदेश में पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने दो टूक कहा कि कानून के शासन में किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता और राज्य की प्रत्येक एजेंसी को संविधान के अनुरूप कार्य करना होगा
ये भी पढ़ें बदनपुर के पास भीषण सड़क हादसा, दो बाइकों की टक्कर में एटा के दो युवक गंभीर, अलीगढ़ रेफर












