भक्ति पर्व समागम में गूंजा संदेश “भक्ति केवल शब्द नहीं, जीवन जीने की सजग यात्रा

भक्ति पर्व समागम में गूंजा संदेश “भक्ति केवल शब्द नहीं, जीवन जीने की सजग यात्रा है

संवाददाता मुकेश कुमार एटा. निरंकारी मिशन द्वारा अविनाशी सहाय आर्य विद्यालय परिसर में भक्ति भाव से सराबोर भक्ति पर्व समागम का दिव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर सत्संग, सेवा और सुमिरन के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की।

समागम में निरंकारी मिशन ब्रांच एटा के मंचासीन संत सेवाराम ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन संदेशों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्ति कोई दिखावा या नाम मात्र नहीं, बल्कि आत्म-मंथन की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति तब मानी जाती है जब व्यक्ति पहले स्वयं को परखे, अपनी कमियों को सुधारे और हर क्षण जागरूक जीवन जिए। उन्होंने कहा कि अज्ञान में हुई भूल सुधारी जा सकती है, लेकिन जानबूझकर किसी को ठेस पहुँचाना भक्ति नहीं है, क्योंकि भक्त का स्वभाव मरहम जैसा होता है। हर प्राणी में निराकार को देखकर सरल, निष्कपट व्यवहार करना और ब्रह्मज्ञान के पश्चात सेवा, सुमिरन व सत्संग से इस भाव को बनाए रखना ही वास्तविक भक्ति है।

संतों ने निरंकारी राजपिता जी के विचारों का भी उल्लेख करते हुए बताया कि भक्ति कोई पद, पहचान या अपनी बनाई हुई परिभाषा नहीं है, बल्कि ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर करता-भाव के समाप्त होने से उपजा जीवन जीने का ढंग है। यदि भक्ति को उपलब्धियों या अहंकार से जोड़ा जाए तो करता-भाव जीवित रहता है। भक्ति कोई सौदा नहीं, बल्कि प्रेम का चुनाव है, जहाँ प्रयास होते हैं, पर दावा नहीं।

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने माता सविंदर जी एवं राजमाता जी के जीवन को भक्ति, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा का सजीव उदाहरण बताते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन प्रत्येक श्रद्धालु के लिए प्रेरणास्रोत है।

मीडिया सहायक अमित कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि हरियाणा स्थित संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल, समालखा में भी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में भव्य रूप से भक्ति पर्व समागम आयोजित किया गया, जिसमें देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता की और आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।

इस अवसर पर परम संत संतोख सिंह जी सहित अन्य संत महापुरुषों के तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में दिए गए योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया। श्रद्धालुओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेकर भक्ति, सेवा एवं समर्पण के मूल्यों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।

समागम के दौरान वक्ताओं, कवियों एवं गीतकारों ने गुरु महिमा, भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेशों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। संपूर्ण वातावरण श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से ओतप्रोत दिखाई दिया।

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