भारत-अमेरिका टैरिफ समझौते पर हलधर किसान यूनियन की चेतावनी
किसानों, मछुआरों और पशुपालकों की आजीविका पर संकट की आशंका संसद में बहस की मांग
संवाददाता योगेन्द्र सिंह नई दिल्ली/ भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते में टैरिफ व्यवस्था को लेकर ग्रामीण भारत में चिंता गहराने लगी है। भारतीय हलधर किसान यूनियन ने इसे किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों के लिए गंभीर खतरा बताते हुए सरकार से पूर्ण पारदर्शिता और संसदीय बहस की मांग की है।
यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर धीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि प्रस्तावित टैरिफ समझौते को सार्वजनिक किया जाए और संसद में इस पर विस्तृत चर्चा कराई जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि असमान टैरिफ संरचना (जैसे 18% बनाम 0%) लागू की गई तो यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य संप्रभुता पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा।
राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय कोर कमेटी के उपाध्यक्ष डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने ऑनलाइन बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में देशभर के किसान, मछुआरा और पशुपालक संगठनों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कृषि, मत्स्य पालन और पशुपालन देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। विदेशी उत्पादों को अनुचित टैरिफ छूट देकर भारतीय उत्पादकों को असमान प्रतिस्पर्धा में धकेलना संविधान की भावना के विपरीत है।
डॉ. गिरि ने कहा कि मछुआरा समुदाय पहले से ही बढ़ती लागत और बाजार अस्थिरता से जूझ रहा है। यदि अमेरिकी उत्पादों जैसे DDGS, सोयाबीन ऑयल और फलों पर टैरिफ छूट दी गई, तो घरेलू उत्पादकों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निर्णय लिए गए और बाद में किसानों को नुकसान झेलना पड़ा।
यूनियन की प्रमुख मांगें:
सभी प्रस्तावित टैरिफ समझौतों को तत्काल सार्वजनिक किया जाए।
समझौते को संसद में पूर्ण बहस के लिए रखा जाए।
किसान, मछुआरा और पशुपालक संगठनों से औपचारिक विमर्श किया जाए।
MSP, मत्स्य मूल्य संरक्षण और दुग्ध/पशुधन बाजारों से कोई समझौता न हो।
संवैधानिक और कानूनी प्रश्न
यूनियन ने अनुच्छेद 38, 39(b), 39(c), 43, 47 और 48 के तहत कृषि, मत्स्य और पशुपालन के हितों की सुरक्षा का हवाला देते हुए पूछा है कि क्या इन प्रावधानों के अनुरूप परीक्षण किया गया है। साथ ही, राज्य सूची के विषय होने के बावजूद राज्यों से परामर्श न लेने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
WTO के विशेष एवं विभेदक उपचार (Special and Differential Treatment) प्रावधानों के अनुरूपता पर भी स्पष्ट जवाब मांगा गया है।
डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में इस समझौते से किसानों, मछुआरों या पशुपालकों को नुकसान हुआ, तो संगठन देशव्यापी लोकतांत्रिक और संवैधानिक आंदोलन के लिए तैयार रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत और अन्नदाता के हितों की रक्षा के लिए होगा।
हालांकि सरकार का दावा है कि डेयरी, मुख्य अनाज और पोल्ट्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा गया है, लेकिन यूनियन का कहना है कि पूरी पारदर्शिता और हितधारकों की भागीदारी के बिना किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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