“कानून सबके लिए या सिर्फ आम जनता के लिए?” — इंदौर ट्रैफिक पुलिस पर उठते सवाल
संतोष यादव की रिपोर्ट 

इंदौर। शहर में ट्रैफिक नियमों के नाम पर चल रही कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। इन दिनों इंदौर ट्रैफिक पुलिस की सख्ती आम नागरिकों को “नियम पालन” से ज्यादा “वसूली” जैसी महसूस हो रही है। शहर के प्रमुख चौराहों पर तैनात पुलिसकर्मी हर गुजरने वाले वाहन चालक पर नजर गड़ाए खड़े हैं, जिससे लोगों में असहजता और नाराजगी बढ़ती जा रही है। मुख्य सिग्नल पॉइंट्स पर स्थिति ऐसी बन गई है मानो इंदौर का आम नागरिक होना ही एक तरह का अपराध हो गया हो। हेलमेट नहीं तो चालान, सीट बेल्ट नहीं तो चालान, ट्रिपलिंग तो चालान — नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब इन नियमों के लागू होने में समानता नजर नहीं आती। हाल ही में महू नाका चौराहे पर घटी एक घटना ने इस मुद्दे को और हवा दे दी। रेड सिग्नल पर रुके एक बुजुर्ग दंपति को ट्रैफिक पुलिस ने रोक लिया। उनके पास सीमित पैसे थे, उन्होंने काफी विनती भी की, लेकिन अंततः उन्हें करीब 150 रुपए देकर ही आगे बढ़ने दिया गया। इसके तुरंत बाद एक अन्य वाहन चालक, जो अपनी पत्नी के साथ था, उसका भी चालान काटा गया क्योंकि पत्नी ने हेलमेट नहीं पहना था। नियम के तहत कार्रवाई हुई, लेकिन घटनास्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार, इसी दौरान एक स्थानीय पार्षद अपनी पत्नी के साथ बिना हेलमेट के वहां से गुजर गए—और पुलिस की नजरें उन पर नहीं पड़ीं।
यही सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है—
क्या कानून सबके लिए बराबर है, या रसूखदारों के लिए अलग नियम हैं?
यदि नियमों का पालन सख्ती से कराया जा रहा है, तो फिर उसमें भेदभाव क्यों? आम नागरिकों पर तुरंत कार्रवाई और प्रभावशाली लोगों को नजरअंदाज करना, कानून की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। ट्रैफिक नियमों का उद्देश्य सुरक्षा है, न कि लोगों में भय या असमानता की भावना पैदा करना। जरूरत इस बात की है कि कार्रवाई पारदर्शी और निष्पक्ष हो—ताकि आम जनता का विश्वास बना रहे और कानून का सम्मान भी।












