शहर इकाई आमने-सामने गुटबाजी से पार्टी की साख पर संकट

कांग्रेस में कलह: एटा में ज़िला और शहर इकाई आमने-सामने गुटबाजी से पार्टी की साख पर संकट

संवाददाता धर्मेंद्र चौहान. एटा, उत्तर प्रदेश. जहां एक ओर कांग्रेस पार्टी अपने खोए हुए जनाधार को फिर से स्थापित करने की कवायद में जुटी है, वहीं एटा ज़िले में संगठनात्मक फूट पार्टी की राह में बड़ी बाधा बनकर उभर रही है। ज़िला कांग्रेस कमेटी और शहर कांग्रेस कमेटी के बीच बढ़ती खींचतान और संवादहीनता अब सार्वजनिक रूप ले चुकी है, जिससे कांग्रेस की छवि पर सीधा सवाल उठने लगे हैं।

जिला और शहर अध्यक्ष आमने-सामने

जिला कांग्रेस अध्यक्ष हाजी आशिक अली भोले और शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनीत पाराशर के बीच पिछले कुछ समय से चल रही तनातनी अब खुलकर सामने आ गई है। सूत्रों के अनुसार यह सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और जातिगत प्राथमिकताओं के चलते और अधिक जटिल हो गई है।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों नेता रिश्तेदारी में जीजा-साले भी हैं, लेकिन इसके बावजूद संगठन में समन्वय की भारी कमी देखी जा रही है। पार्टी के मूल सिद्धांत — सर्वधर्म समभाव और समावेशिता — पर जातिगत राजनीति के आरोप लगने से कांग्रेस की सेक्युलर पहचान को गहरा आघात पहुंचा है।

आईवाईसी नेता भी विवाद में घसीटे गए

हाल ही में 94 वोटों से निर्वाचित हुए इंडियन यूथ कांग्रेस (आईवाईसी) के युवा नेता पुष्पेंद्र बघेल को भी इस आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा। आरोप है कि जिलाध्यक्ष के मीडिया प्रभारी तसव्वुर ने उनके शपथ ग्रहण समारोह के दौरान उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया, जिससे आहत होकर पुष्पेंद्र द्वारा इस्तीफा देने की चर्चा तेज हो गई है।

पार्टी कार्यकर्ता असमंजस में

स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस की स्थिति है। शहर और ज़िले की इकाइयों द्वारा अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने से संगठन में समन्वय की कमी साफ झलक रही है। कार्यकर्ताओं को यह समझ नहीं आ रहा कि वे किसके निर्देशों का पालन करें।

वरिष्ठ नेताओं से हस्तक्षेप की मांग

कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और हाईकमान से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका मानना है कि यदि समय रहते यह विवाद नहीं सुलझाया गया, तो यह कलह एटा में ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में कांग्रेस के लिए संगठनात्मक संकट का कारण बन सकती है।

जातिवादी राजनीति के आरोप

जिलाध्यक्ष हाजी भोले पर जातिवादी राजनीति को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यह आरोप कांग्रेस की सेक्युलर राजनीति की विचारधारा से बिल्कुल विपरीत है और आगामी चुनावों से पहले पार्टी की छवि को और धक्का पहुंचा सकता है।

निष्कर्ष:

एटा में कांग्रेस की आंतरिक खींचतान एक संगठनात्मक चेतावनी बनकर सामने आई है। यदि जल्द ही शहर और ज़िले की इकाइयों के बीच समन्वय स्थापित नहीं किया गया, तो यह कलह पार्टी की ज़मीनी पकड़ को और कमजोर कर सकती है। समय की मांग है कि शीर्ष नेतृत्व मामले को गंभीरता से ले और एकजुटता की दिशा में ठोस कदम उठाए।

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