किसानों पर जुर्माना, लेकिन नगर पालिका को छूट? कूड़ा जलाने से उठे गंभीर सवाल

किसानों पर जुर्माना, लेकिन नगर पालिका को छूट? कूड़ा जलाने से उठे गंभीर सवाल

संवाददाता योगेन्द्र सिंह

एटा। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर खेतों में पराली और कृषि अवशेष जलाने वाले किसानों पर प्रशासन सख्ती से कार्रवाई करता है और भारी जुर्माना भी लगाया जाता है। लेकिन जब नगर पालिका परिषद स्वयं खुलेआम कूड़ा जलाती नजर आए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियम केवल किसानों के लिए हैं? मामला कोतवाली नगर क्षेत्र में तहसील सदर के सामने तथा पशु चिकित्सालय के समीप स्थित स्थान का बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार नगर पालिका कर्मचारी विभिन्न स्थानों से एकत्रित कूड़े को सड़क किनारे ढेर लगाकर उसमें आग लगा देते हैं। कूड़ा जलने के बाद उसे जेसीबी की मदद से ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर अन्य स्थानों पर भेज दिया जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जलाए जाने वाले कूड़े में प्लास्टिक, पॉलीथीन, रबर, कपड़े और अन्य ठोस अपशिष्ट भी शामिल होते हैं। इनके जलने से निकलने वाला जहरीला धुआं आसपास के क्षेत्रों में फैलकर लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। लोगों को सांस लेने में दिक्कत, आंखों में जलन और दुर्गंध जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि खेत में पराली जलाना पर्यावरण प्रदूषण की श्रेणी में आता है और उसके लिए किसानों पर जुर्माना लगाया जाता है, तो नगर पालिका द्वारा कूड़ा जलाने की जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्या सरकारी संस्थाओं पर नियम लागू नहीं होते? पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरे को जलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड, डाइऑक्सिन, फ्यूरान समेत कई जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं। ये गैसें बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और श्वास संबंधी रोगियों के लिए विशेष रूप से खतरनाक साबित हो सकती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका रहती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार अभियान चला रही है, लेकिन यदि सरकारी निकाय ही नियमों का पालन नहीं करेंगे तो आम जनता में गलत संदेश जाएगा। उन्होंने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। नगरवासियों ने प्रशासन से यह भी मांग की है कि कूड़े के वैज्ञानिक निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था की जाए और खुले में कूड़ा जलाने की प्रथा पर तत्काल रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि यह मामला अब केवल स्वच्छता का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन चुका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि प्रदूषण फैलाने पर किसानों के खिलाफ कार्रवाई होती है, तो नगर पालिका द्वारा कूड़ा जलाने के मामलों में जिम्मेदारी तय कर क्या समान कार्रवाई की जाएगी?

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