जिन हाथों ने गढ़ी थी मां दुर्गा की पहली प्रतिमा, उन्हीं हाथों को समाजसेवी आदर्श पांडेय ने किया सम्मानित
जिला संवाददाता अमित शुक्ला
डीहबलई में दुर्गा पूजा परंपरा की प्रथम प्रेरणास्रोत अनीता देवी को शॉल, साड़ी, मिष्ठान और सम्मान फ्रेम भेंट कर किया गया सम्मानित
कुंडा, प्रतापगढ़। किसी भी परंपरा की शुरुआत भले ही छोटे प्रयास से होती है, लेकिन समय के साथ वही समाज की पहचान बन जाती है। ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण कुंडा क्षेत्र की ग्रामसभा डीहबलई में देखने को मिला, जहां वर्षों पहले अपने हाथों से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर पूजा की शुरुआत करने वाली बुजुर्ग महिला अनीता देवी को युवा आदर्श पांडेय ने सम्मानित कर उनके योगदान को याद किया।
डीहबलई निवासी अनीता देवी, पत्नी नन्हे लाल निर्मल ने वर्षों पहले मां दुर्गा की प्रतिमा स्वयं बनाकर गांव में पूजा-अर्चना की शुरुआत की थी। उस समय न भव्य पंडाल थे और न ही बड़े आयोजन की व्यवस्था, लेकिन मां दुर्गा के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने ऐसी परंपरा की नींव रखी, जो आज पूरे गांव की सामूहिक आस्था का प्रतीक बन चुकी है।
समय के साथ ग्रामीणों की सहभागिता बढ़ी और दुर्गा पूजा समिति के गठन के बाद आयोजन को भव्य स्वरूप मिला। आज गांव में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। इस भव्य परंपरा के पीछे अनीता देवी की शुरुआती पहल और समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
आदर्श पांडेय की पहल बनी चर्चा का विषय
दुर्गा पूजा के अवसर पर युवा आदर्श पांडेय ने मां दुर्गा के सजे पंडाल में ग्रामीणों और पूजा समिति के सदस्यों की मौजूदगी में अनीता देवी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। उन्हें साड़ी, मिष्ठान और मां दुर्गा की तस्वीर से सुसज्जित विशेष सम्मान फ्रेम भी भेंट किया गया। सम्मान फ्रेम पर ‘डीहबलई दुर्गा पूजा परंपरा सम्मान’ अंकित किया गया।
भव्य आयोजन के पीछे छिपे योगदान को मिली पहचान
यह सम्मान केवल एक बुजुर्ग महिला का अभिनंदन नहीं, बल्कि गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोने की सराहनीय पहल है। अक्सर बड़े आयोजनों की चमक-दमक में उन लोगों का योगदान पीछे छूट जाता है, जिन्होंने बिना किसी पद या प्रतिष्ठा की इच्छा के परंपराओं की नींव रखी होती है।
आदर्श पांडेय की इस पहल ने संदेश दिया कि समाज को अपने उन लोगों को उनके जीवनकाल में ही सम्मान देना चाहिए, जिनके प्रयासों से गांव की पहचान और सांस्कृतिक विरासत मजबूत हुई है।
जिन हाथों ने कभी मिट्टी से मां दुर्गा की प्रतिमा गढ़ी थी, उन्हीं हाथों का सम्मान कर डीहबलई में श्रद्धा, कृतज्ञता और बुजुर्गों के प्रति आदर की एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की गई। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपराओं के सूत्रधारों को याद रखने की प्रेरणा देती रहेगी।











