कभी जीतकर भी मैं हारा हूँ, अपने आप से, अपनों से, या किस्मत से?
कभी कभी जीत कर भी मैं हारा हूं
इस अनजान शहर में
अकेला मैं ही एक हूं
जिसे जीत कर भी मिली है हार
अजनबी शहर और थे अजनबी लोग
को कहने को तो थे अपने
पर अजनबी था वो मंज़र
वो सारे अपने होकर भी रहे गैर
और मैं हार गया हर बाजी जीत कर भी
इस शहर ए अजनबी में
मैं रहा हमेशा अकेला ही।
आयशा अल ग़ज़ल
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