हम आज भी डर में जी रहे हैं,आज़ादी का मतलब सिर्फ़ सत्ता बदलना नहीं फैयाज अहमद
दैनिक चक्र ब्यूरो देहरादून देहरादून अपने देश की आज़ादी को जब में याद करता हूं तो सहज ही अपने आसपास शब्दों के कुछ युगल टहलते दिखाई देने लगते हैं,आज़ादी और अराजकता, स्वाभिमान और अहंकार, प्रशंसा और चाटुकारिता, भक्ति और अंधभक्ति, मैं और हम, नारा और कविता, मनुष्यता और संकीर्ण राजनीति, सत्ता-विरोध और देशद्रोह, आंदोलन और आतंक।
आज़ादी क्या है और उसका संकीर्ण, विकृत या भ्रष्ट रूप क्या हो सकता है, शायद इन शब्द-युगलों में ही इसका जवाब छिपा है।लेकिन एक बात निर्विवाद है। तुलसी ने पराधीन भारत में लिखा था-‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।’ जो व्यक्ति सचमुच अपनी आज़ादी को समझता है, वह अपनी आज़ादी के भीतर किसी दूसरे की गुलामी की इच्छा नहीं कर सकता।आज़ादी केवल सत्ता से मुक्ति का नाम नहीं है। वह भय से मुक्ति भी है। अपमान से मुक्ति भी। अज्ञान से मुक्ति भी। और सबसे बढ़कर उस मानसिकता से मुक्ति है जो दूसरे की स्वतंत्रता को अपने लिए खतरा मानती है।
इसीलिए आज़ादी की बात आते ही गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर याद आते हैं। ‘गीतांजलि’ की वह प्रार्थना—जहां मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊंचा हो,दरअसल किसी एक देश के लिए नहीं, मनुष्य की पूरी मुक्ति का सपना है।टैगोर जिस देश की कल्पना करते हैं, वहां नागरिक डरकर नहीं जीता। वहां ज्ञान पर पहरा नहीं होता। शिक्षा कुछ लोगों की जागीर नहीं होती। समाज जाति, धर्म और संकीर्ण दीवारों में नहीं बंटता। वहां आदमी सच बोलने का साहस रखता है और बेहतर बनने की कोशिश करता है।स्वतंत्रता दिवस पर जब हम ‘जन गण मन’ गाते हैं तो क्या हमें उसके रचयिता की वह दूसरी पुकार भी सुनाई देती है—जहां मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊंचा हो’?यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि ‘गीतांजलि’ का यह सपना उस समय लिखा गया था जब भारत गुलाम था। टैगोर का ‘स्वतंत्र मन’ उस राजनीतिक गुलामी के बीच पैदा हुआ था। इसलिए उनकी आज़ादी केवल अंग्रेजों से मुक्ति की मांग नहीं थी। वह मनुष्य के भीतर स्वतंत्रता पैदा करने की मांग थी।
1913 में नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद टैगोर की रचनाएं कोरिया तक पहुंचीं। उस समय कोरिया भी जापानी साम्राज्यवाद की गुलामी झेल रहा था। कोरियाई लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे। टैगोर की कविताओं में उन्हें अपना दर्द और अपना सपना दिखाई दिया,एक ऐसा भविष्य जिसमें मनुष्य निडर हो और उसका सिर गर्व से ऊंचा रहे।
1929 में जापान की अपनी तीसरी यात्रा के दौरान टैगोर ने कोरिया के लिए एक छोटी-सी कविता लिखी। कोरिया तब जापानी शासन के अधीन था। कविता में उन्होंने उस देश को एशिया का वह दीप बताया जो फिर से जलने की प्रतीक्षा कर रहा था।कविता छोटी थी, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा था,गुलामी स्थायी नहीं होती। अंधेरा अंतिम सत्य नहीं होता। एक दिन बुझा हुआ दीप फिर जल सकता है।यही टैगोर थे। भारत की आज़ादी का सपना देखते हुए भी उनकी निगाह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी। उन्हें मनुष्य की आज़ादी दिखाई देती थी। जहां कहीं गुलामी थी, वहां उन्हें अपना संघर्ष दिखाई देता था।
इसीलिए आज़ादी की हमारी बहस में उन लोगों को भी याद करना चाहिए जिनके नाम इतिहास की मुख्यधारा में दब गए। वे लोग जिनकी कोई बड़ी मूर्ति नहीं लगी। जिनके नाम पर सड़कें नहीं बनीं। जिनकी जयंती पर बड़े-बड़े समारोह नहीं होते।आज़ादी का अर्थ केवल उन महान नामों को याद करना नहीं है जिन्हें हम पहले से जानते हैं। आज़ादी का अर्थ उन अनगिनत लोगों को भी याद करना है जिनकी कुर्बानियों को इतिहास ने हाशिये पर डाल दिया।लेकिन असली सवाल आज भी वहीं है।क्या हमने आज़ादी को सचमुच अपने भीतर उतारा है?क्योंकि राजनीतिक आज़ादी और मानसिक आज़ादी एक चीज नहीं हैं। अंग्रेज चले जाएं और आदमी डर में जीता रहे, तो गुलामी पूरी तरह खत्म नहीं होती। सत्ता बदल जाए लेकिन सवाल पूछने का साहस खत्म हो जाए, तो स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है। संविधान नागरिक को अधिकार दे और समाज उसे बोलने से डराए, तो आज़ादी कागज पर बची रह जाती है।
आज़ादी तब भीतर उतरती है जब हम अपने लिए वही अधिकार दूसरे के लिए भी स्वीकार करते हैं।जब हम अपनी आस्था के सम्मान के साथ दूसरे की आस्था के अधिकार को भी बचाते हैं।जब हम अपनी भाषा से प्रेम करते हुए दूसरी भाषा का अपमान नहीं करते।जब हम अपने देश पर गर्व करते हुए देश के भीतर असहमति की आवाज को देशद्रोह नहीं कहते।जब हम आंदोलन और आतंक के बीच फर्क समझते हैं।जब हम भक्ति और अंधभक्ति के बीच की रेखा पहचानते हैं।जब हम प्रशंसा और चाटुकारिता को एक नहीं मानते।और जब ‘मैं’ धीरे-धीरे ‘हम’ में बदलने लगता है।
भारत केवल भूगोल नहीं है। भारत एक सतत मिलन है। अनेक धाराओं का संगम है। सदियों से अलग-अलग रास्तों से आए मनुष्यों का साझा घर है।इसलिए आज़ादी का उत्सव केवल झंडा फहराने और राष्ट्रगान गाने तक सीमित नहीं हो सकता।हर वर्ष हमें खुद से पूछना होगा—क्या हमारा मन पहले से अधिक भयमुक्त हुआ? क्या हमारा मस्तक पहले से अधिक ऊंचा हुआ? क्या हमने अपने साथ खड़े व्यक्ति की आज़ादी को भी उतना ही महत्व दिया जितना अपनी आज़ादी को?अगर जवाब ‘हां’ है तो हम आज़ादी के अर्थ के करीब हैं।अगर जवाब ‘नहीं’ है तो हमें समझना होगा कि 15 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख है। आज़ादी अभी हमारे भीतर पूरी तरह जन्मी नहीं है।क्योंकि असली आज़ादी वह नहीं जिसमें सिर्फ़ मैं आज़ाद हूं।
असली आज़ादी वह है जिसमें मैं भी आज़ाद हूं और मेरे साथ खड़ा दूसरा इंसान भी।यही टैगोर का सपना था। यही तुलसी की चेतावनी का अर्थ था। और शायद यही हमारी आज़ादी की सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी परीक्षा भी है।
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