गाजियाबाद राज नगर दुर्गा टावर आरडीसी में महानतम पंडित मदन मोहन मालवीय अटल बिहारी वाजपेई जी की जयंती का शुभ अवसर पर दोनों महान विभूतियों की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कार्यक्रम आयोजित किया
दैनिक चक्र न्यूज़ संवाददाता पवन सूर्यवंशी Delhi NCR
मदनमोहन मालवीय भारत के पहले और अंतिम व्यक्ति थे जिन्हें ‘महामना’ की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया!अटलजी एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नेता, प्रखर राजनीतिज्ञ, नि:स्वार्थ सामाजिक कार्यकर्ता, सशक्त वक्ता, कवि, साहित्यकार, पत्रकार और बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के धनी थे!! बीके शर्मा हनुमान गाजियाबाद राजनगर दुर्गा टावर आरडीसी विश्व ब्रह्मऋषि ब्राह्मण महासभा के तत्वाधान में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी एवं अटल बिहारी वाजपेई जी के जयंती के शुभ अवसर पर विश्व ब्रह्मऋषि ब्राह्मण महासभा के पीठाधीश्वर ब्रह्मऋषि विभूति बीके शर्मा हनुमान ने दोनों महान मूर्तियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पं. मदनमोहन मालवीय जी का जन्म 25 दिसंबर, 1861 को इलाहाबाद में हुआ था। पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, मातृभाषा तथा भारत माता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले मालवीय जी ने राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए और भारतीय संस्कृति की जीवंतता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। मालवीय जी के विचारों में राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है, जब वहां के निवासी सुशिक्षित हों। वे जीवनभर गांवों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। मालवीय जी का मानना था कि व्यक्ति अपने अधिकारों को तभी भलीभांति समझ सकता है, जब वह शिक्षित हो। उनका मानना था कि संसार के जो राष्ट्र उन्नति के शिखर पर हैं, वे शिक्षा के कारण ही हैं। मालवीय जी ने हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान’ का 1887 से संपादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। वे 1924 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ जुड़े। हिन्दी के उत्थान में मालवीय जी की भूमिका ऐतिहासिक रही। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि हिंदी को फारसी-अरबी के बड़े-बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूंथना भी अच्छा नहीं है। उनकी भविष्यवाणी थी कि एक दिन हिन्दी ही देश की राष्ट्रभाषा होगी। मालवीय जी संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी तीनों ही भाषाओं के ज्ञाता थे। वे अपने सरल स्वभाव के कारण लोगों के बीच प्रिय थे। 12 नवंबर1946 को मालवीय जी का निधन हो गया था और वे देश को स्वतंत्र होते नहीं देख सके थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता महामना पंडित मदनमोहन मालवीय को 2014 में मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में रहने वाले एक स्कूल शिक्षक के परिवार में हुआ। पिता कृष्णबिहारी वाजपेयी हिन्दी व ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे। अत: काव्य कला उन्हें विरासत में मिली। उन्होंने अपना करियर पत्रकार के रूप में शुरू किया था और राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया।राजनीतिक जीवन : वाजपेयी जी अपने छात्र जीवन के दौरान पहली बार राजनीति में तब आए जब उन्होंने वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वह राजनीति विज्ञान और विधि के छात्र थे और कॉलेज के दिनों में ही उनकी रुचि विदेशी मामलों के प्रति बढ़ी। 1951 में भारतीय जन संघ में शामिल होने के बाद उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी। आज की भारतीय जनता पार्टी को पहले जन संघ के नाम से जाना जाता था। वाजपेयी जी राजनीति के क्षेत्र में चार दशकों तक सक्रिय रहे। वह लोकसभा में नौ बार और राज्यसभा में दो बार चुने गए जो कि अपने आप में ही एक कीर्तिमान है। वाजपेयी 1980 में गठित भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे। 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने : कवि हृदय वाजपेयी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने लगातार दूसरी बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नई गठबंधन सरकार के प्रमुख के रूप में भारत के प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया। वे 1996 में बहुत कम समय के लिए प्रधानमंत्री बने थे। इसके अलावा विदेश मंत्री, संसद की विभिन्न महत्वपूर्ण स्थायी समितियों के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने आजादी के बाद भारत की घरेलू और विदेश नीति को आकार देने में एक सक्रिय भूमिका निभाई। पुरस्कार और सम्मान : आजीवन अविवाहित रहे अटलजी को अटलजी को 2015 में सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत के प्रति निस्वार्थ समर्पण और समाज की सेवा के लिए भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दिया गया। 1994 में उन्हें भारत का ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ चुना गया। इनके अलावा भी उन्हें कई पुरस्कार, सम्मान और उपाधियों से नवाजा गया।
विशेष : परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों से बिना डरे वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने वर्ष 1998 में राजस्थान के पोखरण में द्वितीय परमाणु परीक्षण किया। इसकी अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए को भनक तक नहीं लग पाई। अटल जी नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लंबे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी रहे। अटल ही पहले विदेशमंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। अटल बिहारी वाजपेयी जी का किडनी में संक्रमण और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के चलते अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में 16 अगस्त 2018 को उनका निधन हो गया।
‘बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।’
अपनी इन्हीं पंक्तियों की तरह थे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी। अपनी पार्टी का नेता हो या विरोधी पार्टी का, सबको साथ लेकर चलने की खूबी उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती थी। यही कारण था कि उन्हें अजातशत्रु भी कहा जाता था। इस अवसर पर विश्व ब्रह्म ऋषि ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय संस्थापक उपाध्यक्ष पंडित आरसी शर्मा, संगठन मंत्री मनोज शर्मा, संगठन मंत्री आर पी शर्मा, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष पंडित महेश कुमार शर्मा, ब्राह्मण शिरोमणि आशु पंडित, अनिल कुमार शर्मा योगेश कुमार, एसके मिश्रा, पवन वर्मा, संजय सिंह, नरेंद्र मेहता, मिलन मंडल, रंजीत पोद्दार, दिलीप कुमार, अतुल शर्मा, मुकेश गोयल, नानक चंद तोमर, वरिष्ठ समाज सेवी छोटेलाल कनौजिया, गुलाब सिंह, प्रीति श्रीवास्तव, सचिन भारती दैनिक चक्र कि संवाददाता सायरा सूर्यवंशी सभी मौजूद थे












