जनपद में नववर्ष पर निरंकारी सतगुरु का खुशियों और आशीष से परिपूर्ण पावन संदेश
संवाददाता योगेन्द्र सिंह
निरंकार की रजा में जीवन जीना ही सच्ची साधना
निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज
एटा | 02 जनवरी 2026 ‘निरंकार की रजा में जीवन जीना ही सच्ची साधना है।’ यह प्रेरणादायी संदेश निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने नववर्ष के शुभ अवसर पर दिल्ली स्थित ग्राउंड नंबर–8, निरंकारी चौक, बुराड़ी रोड पर आयोजित विशेष सत्संग समारोह में दिया। उक्त जानकारी निरंकारी मण्डल ब्रांच एटा के मीडिया सहायक अमित कुमार ने सिंधी कॉलोनी में आयोजित सत्संग के दौरान दी। उन्होंने बताया कि इस भव्य सत्संग समारोह में दिल्ली, एनसीआर सहित देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। इस अवसर पर एटा से भी बड़ी संख्या में निरंकारी भक्त उपस्थित रहे। नववर्ष के प्रथम दिन श्रद्धालुओं ने सतगुरु माता जी एवं निरंकारी राजपिता जी के पावन सान्निध्य में दिव्य दर्शन कर आत्मिक शांति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम अनुभव प्राप्त किया। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि नववर्ष का प्रथम दिवस संतों के वचनों को सुनने और उन्हें जीवन में उतारने का अनमोल अवसर प्रदान करता है। जहाँ सामान्यतः संसार नववर्ष की शुरुआत मौज-मस्ती से करता है, वहीं संत सत्य, सत्संग और आत्मचिंतन का मार्ग चुनते हैं। सत्संग से आरंभ हुआ जीवन निरंतर निरंकार के एहसास को और अधिक दृढ़ करता जाता है। उन्होंने कहा कि तार्किक रूप से नववर्ष केवल पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण और ऋतुओं का परिवर्तन है। हम शुभकामनाएँ देते हैं और नए संकल्प लेते हैं, परंतु वास्तविक परिवर्तन तभी सार्थक होता है जब वह भीतर से उत्पन्न हो। संत आत्ममंथन द्वारा सकारात्मक बदलाव लाते हैं और निरंकार को सर्वोपरि मानकर सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन की प्राथमिकता बनाते हैं। सतगुरु माता जी ने कहा कि एक सच्चे भक्त की यही कामना होती है कि प्रत्येक नया वर्ष उसे सेवा, सुमिरन और सत्संग से और अधिक जोड़े, साथ ही वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाए। जब जीवन स्वयं एक संदेश बन जाए और कर्म शब्दों से अधिक प्रभावशाली हों, तभी सच्ची साधना प्रकट होती है।
उन्होंने आगे कहा कि पूरी चेतन अवस्था के साथ निरंकार के एहसास में जीना ही वास्तविक जीवन है, क्योंकि भूत और भविष्य माया स्वरूप हैं। जब मन में यह विश्वास दृढ़ हो जाए कि कल भी दातार की रज़ा थी और आज भी उसकी कृपा है, तो चिंताएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं और जीवन सहज, सरल एवं संतुलित बन जाता है। नववर्ष केवल तारीख़ बदलने का नाम नहीं, बल्कि प्रेम, मिठास, सौम्यता और समझ को अपनाने का अवसर है। मनमुटाव और द्वेष से दूर रहकर, दूसरों की भावनाओं को समझते हुए, दोषों पर पर्दा डालकर गुणों को ग्रहण करना ही सच्ची भक्ति है। हर श्वास में सुमिरन और हर क्षण में निरंकार का वास—यही नववर्ष का सच्चा संदेश है।
कार्यक्रम के अंत में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने सभी श्रद्धालुओं के लिए सुख, समृद्धि, शांति एवं आनंदमय जीवन की मंगलकामनाएँ प्रदान कीं।












