गाज़ीपुर डेरीफॉर्म दिल्ली–96’ में पाँच अवैध मस्जिदनुमा ढाँचे: कानून, सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खुली चुनौती
संवाददाता पवन सूर्यवंशी एनसीआर 

एमसीडी सूत्रों के दावे से हड़कंप गाज़ीपुर थाने के क़रीब सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा, फिर भी कार्रवाई शून्य?
डॉक्यूमेंट्स के बिना निर्माण, फर्जी पहचान और तब्लीगी जमात की आवाजाही — गाज़ीपुर मंडी बना राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी का प्रतीक
दिल्ली–गाजियाबाद सीमा पर स्थित गाज़ीपुर मुर्गा, भैंस और बकरा मंडी क्षेत्र में वर्षों से पनप रहा एक गंभीर प्रशासनिक, धार्मिक भूमि-कब्ज़ा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा मामला अब खुलकर सामने आया है। स्थल पर स्वयं जाकर किए गए सर्वे, स्थानीय नागरिकों, मंडी कर्मियों और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के वरिष्ठ अधिकारियों से हुई बातचीत तथा उपलब्ध वीडियो-फोटो साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। सीमावर्ती क्षेत्रों, अवैध कब्ज़ों, आंतरिक सुरक्षा, प्रशासनिक विफलताओं और ज़मीनी सच्चाइयों पर आधारित रिपोर्टिंग के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ खोजी पत्रकार एवं लेखक रविंद्र आर्य की यह रिपोर्ट प्रत्यक्ष अवलोकन और दस्तावेज़ी साक्ष्यों पर आधारित है। जिस रिपोर्ट में यह तथ्य स्पष्ट होता है कि गाज़ीपुर मंडी के शुरुआती दौर में, लगभग वर्ष 2009 के आसपास, गाज़ीपुर डेरीफॉर्म दिल्ली–96 क्षेत्र में दिल्ली नगर निगम द्वारा केवल एक मस्जिद (जामिया मस्जिद) और एक मंदिर की अनुमति दी गई थी। आज स्थिति यह है कि मंदिर अब भी एक ही है, किंतु मस्जिद के नाम पर एक के बाद एक पाँच अवैध मस्जिदनुमा ढाँचे बिना किसी वैध नक्शे, दस्तावेज़, भूमि अधिकार या प्रशासनिक स्वीकृति के खड़े कर दिए गए हैं और वर्षों से संचालित भी हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा अवैध निर्माण गाज़ीपुर थाना से बेहद नज़दीक है।
इसके आसपास ही बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों की सैकड़ों झुग्गी-झोपड़ियाँ सरकारी ज़मीन और मंडी परिसर के भीतर विकसित हो चुकी हैं। ठीक सामने डीडीए के ए, बी, सी और डी ब्लॉक डेरीफॉर्म फ्लैट्स हैं और उनके आसपास मंडी से लेकर बाहरी क्षेत्रों तक सरकारी भूमि पर लगातार अवैध मस्जिदों का निर्माण होता चला गया, जबकि प्रशासन दावा करता रहा कि उसे इसकी “जानकारी तक नहीं” थी। स्थानीय डेरीफॉर्म निवासियों की गुप्त शिकायत और एमसीडी की आंशिक कार्रवाई स्थानीय डेरीफॉर्म निवासियों ने दो वर्ष पूर्व दिल्ली नगर निगम को गुप्त शिकायत दी थी कि सरकारी ज़मीन पर जामिया मस्जिद के पीछे अवैध विस्तार किया जा रहा है। एमसीडी सूत्रों के अनुसार, गुप्त सूचना के आधार पर अवैध मस्जिद के पीछे बनाए जा रहे बड़े हॉल और कमरे को नींव से लेकर लैंटर तक बनाया जा रहा था, जिसको एमसीडी ने ध्वस्त किया। लेकिन मूल मस्जिदनुमा ढाँचा और उससे जुड़े अन्य चार अवैध मस्जिदों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।बिना किसी नक्शे या दस्तावेज़ के बने इन धार्मिक ढाँचों, टीनशेड और स्टाफ रूमनुमा कमरों को धार्मिक गतिविधियों के नाम पर अछूता छोड़ दिया गया है। जहाँ आज भी नमाजे पढ़ने के टाइमिंग बोर्ड खुलेआम लगे है। मंडी परिसर के भीतर खुले धार्मिक गतिविधियाँ और तब्लीगी जमात रिपोर्टिंग के दौरान यह भी पाया गया कि बकरा मंडी और भैंस मंडी परिसर के भीतर अस्थायी स्टॉफ कमरों मे उसके बहार टीनसेट में आज भी टाइमिंग बोर्ड लगाकर नमाज़ अदा की जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ लंबे समय से तब्लीगी जमातों का ठहराव और आना-जाना लगा रहता है। प्रारंभिक रूप से लगभग 15×15 फीट का ढाँचा अब पाँच अवैध मस्जिदों और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र में तब्दील हो चुका है।
इन अवैध ढाँचों पर बाकायदा उर्दू और अंग्रेज़ी में बोर्ड लगाए गए हैं —
“Jamia Ghazipur Dairy Farm Delhi-96”।
जानबूझकर न लाउडस्पीकर लगाए गए, न औपचारिक मस्जिद जैसा स्वरूप दिया गया, ताकि अवैध कब्ज़ा, तब्लीगी गतिविधियाँ और बांग्लादेशी-रोहिंग्या नेटवर्क प्रशासन की नज़र से बचा रहे।बांग्लादेशी-रोहिंग्या नेटवर्क ने फंड इकट्ठा कर गाज़ीपुर मुर्गा मंडी में अवैध मस्जिद बना डाली इसी के सामने और पीछे सरकारी ज़मीन पर अनेकों कब्ज़े और झोपड़ी-नुमा ‘भूरा होटल’ खुलेआम अवैध कब्ज़े का उदाहरण है। संदिग्ध आवाजाही, प्रभावशाली नाम और सुरक्षा जोखिम स्थानीय नागरिकों, मंडी कर्मचारियों और एमसीडी के गुप्त सूत्रों के अनुसार , तब्लीगी जमात से जुड़े लोग यहाँ नियमित रूप से ठहरते रहे हैं। बंगाल, असम, नॉर्थ-ईस्ट, बांग्लादेश और रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय की पृष्ठभूमि से जुड़े संदिग्ध लोगों की आवाजाही देखी गई है। सूत्रों के अनुसार, अहसान नाम का प्रभावशाली व्यक्ति मंडी के अंदर-बाहर की गतिविधियों का संचालन करता है। गाज़ीपुर मंडी रात दो बजे तक सक्रिय रहती है, जहाँ बिना किसी लोगो के सत्यापन के भारी भीड़ और अव्यवस्थित गतिविधियाँ दिल्ली-एनसीआर की सुरक्षा पर प्रश्न खड़ा करती हैं। अब सवाल मुख्य यह बनता है की जब वहाँ गाज़ीपुर थाना पुलिस ओर एमसीडी कर्मचारी बहार से आने वाले सभी ट्रकों जों बकरा ओर भैंस के भरे हुए होते है उन ट्रकों से खुलेआम प्रति ट्रक 1000/- रूपये से 1500 रुपये लेकर अबैध वसूली करते दिखते है,तब उन सभी ट्रक का स्थाई ट्रोलनुमा नाके पर डाटा बनाया जाता है। रिकॉर्ड रजिस्टर मे लिखा जाता है, तो आने जाने वाले कर्मचारियों ओर मजदूरों का डाटा क्यों नहीं बनाया जाता।
क़ब होंगी यह सत्यापन परिक्रिया? 500 मीटर पर गाज़ीपुर थाना, सैकड़ों झुग्गियाँ और पुलिस का रवैया गाज़ीपुर थाना से मात्र 500 मीटर पर सरकारी भूमि पर सौ से अधिक अबैध झुग्गियाँ बनी हैं। आधार, पहचान और सत्यापन को लेकर कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं। इंद्रापुरम क्षेत्र में भी यही हाल है।
पुलिस का यह कहना कि “शिकायत होगी तभी कार्रवाई करेंगे”, सीधे तौर पर इमिग्रेशन और विदेशियों संबंधी विधेयक–2025 की भावना पर प्रश्नचिह्न है। इमिग्रेशन और विदेशियों संबंधी विधेयक–2025 बनाम ज़मीनी हकीकत कानून लागू होने के बावजूद गाज़ीपुर मंडी और इंद्रापुरम में सैकड़ों अवैध बांग्लादेशी-रोहिंग्या झुग्गियाँ मौजूद हैं। डिटेंशन सेंटर की बातें केवल काग़ज़ों तक सीमित दिखाई देती हैं।
फर्जी पहचान, श्रम, भीख और संगठित नेटवर्क
पाँचों मस्जिदों में संदिग्ध विदेशी नियमित नमाज़ अदा करते हैं।फर्जी पहचान पत्रों का नेटवर्क सक्रिय है। गाज़ीपुर मंडी अब श्रम, भीख, कूड़ा बीनने लेंड जिहाद और अवैध गतिविधियों का केंद्र बन चुकी है। बांग्लादेशी-रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय अब ट्रांसजेंडर बनकर मेकअप कर भीख मांगना ओर अप्राकृतिक कृत्य जगह-जगह देखने को मिलेंगे, जिसमें सस्ती मजदूरी — नेटवर्क मयूर विहार, नोएडा, इंद्रापुरम, वैशाली, कौशांबी, आज़ादपुर मंडी और साहिबाबाद सब्जी मंडी तक फैला है।
योगी सरकार के निर्देश और प्रशासनिक निष्क्रियता
निर्देशों के बावजूद न सत्यापन, न कार्रवाई। प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल। प्रशासन, खुफिया एजेंसियाँ और जवाबदेही पुलिस जांच से बचती रही। खुफिया एजेंसियाँ निष्क्रिय। यह धर्म नहीं, कानून, सरकारी ज़मीन और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। मीडिया रिपोर्टों में पहले भी सीमांचल, पश्चिम बंगाल के विहार बॉर्डर के किशन गंज से मजदूरों को मात्र 10 रुपए मे भारतीय बना दिया जाता है, और जिसके तार दिल्ली-एनसीआर तक फैले है। फर्जी आधार कार्ड नेटवर्क की ओर इशारा भी किया जा चुका है। उदारण: एस आई आर के उपरांत पच्छिम बंगाल मे सैकड़ो फर्जी पहचान पत्रों के प्रमाण् नालों मे बिखरे पाए जाते है। दिल्ली ओर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवैध प्रवासियों की पहचान, सत्यापन और डिटेंशन सेंटर भेजने के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद गाजियाबाद–दिल्ली बॉर्डर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में न तो कोई व्यापक सत्यापन अभियान दिखता है और न ही ठोस कार्रवाई, जिससे प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
दिल्ली एनसीआर रीजन एमसीडी के शीर्ष अधिकारियों को सूचना और अगली कार्रवाई
दिल्ली सी. एम. रेखा गुप्ता, दिल्ली एमसीडी कमिश्नर अश्विनी कुमार जिनकी नियुक्ति केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा की गई है , पीए मंगल सिंह, विजिलेंस डायरेक्टर, अनिल कुमार यादव, चीफ विजिलेंस, नीवा जैन और गाज़ीपुर मंडी क्षेत्र के एमसीडी डिप्टी कमिश्नर बादल कुमार एवं गाजियाबाद महापौर श्रीमति सुनीता दयाल कों वीडियो-फोटो, बाईट सहित मौखिक ओर ईमेल द्वारा आधिकारिक शिकायत दी जा रही है।
सवाल आज भी जस के तस —
सरकारी ज़मीन, अधूरा ध्वस्तीकरण, झुग्गियाँ, सत्यापन और जिम्मेदारी किसकी?
जनहित की माँग
संयुक्त जांच, डोर-टू-डोर सत्यापन और निष्पक्ष कार्रवाई।
अब देखना है — प्रशासन जागेगा या चुप्पी किसी बड़े खतरे की भूमिका बनेगी।
सवाल आज भी जस के तस हैं —
• सरकारी ज़मीन पर ये ढाँचे कैसे खड़े हुए?
• आधा ध्वस्तीकरण हुआ, पूरा क्यों नहीं?
• मंडी परिसर धार्मिक गतिविधियों का अड्डा कैसे बना?
• सैकड़ों झुग्गियाँ किसकी अनुमति से बसीं?
• पूर्ण सत्यापन और कार्रवाई की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
जनहित में स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की माँग है कि जामिया गाज़ीपुर डेरीफॉर्म दिल्ली–96 के नाम से बने सभी अवैध ढाँचों की एमसीडी, पुलिस, डीडीए और खुफिया एजेंसियों द्वारा संयुक्त जांच हो, पूरे क्षेत्र का डोर-टू-डोर सत्यापन कराया जाए और अवैध कब्ज़ों पर तत्काल निष्पक्ष कार्रवाई हो।
अब देखना यह है कि दिल्ली–गाजियाबाद–नोएडा प्रशासन इस खुली चुनौती पर कब जागता है या फिर यह चुप्पी किसी बड़े खतरे की भूमिका बनती रहे












