करीब 2 साल के समय में सीताराम शर्मा ने जेल की छवि को निखार कर रख दिया,जेल का माहौल बदला, असल सुपर हिरो है लोगों की सोच बदली..!
जीवन जीने की कला अगर देखनी हो तो गाजियाबाद जेल में देखी जा सकती है जहां पर बंदियों ने अपने जीवन में सुधार किया है
पवन सूर्यवंशी ब्यूरो चीफ़ ऑल एनसीआर
सीताराम शर्मा के बेहतर कामों की जितनी चर्चा की जाए कम!जेल अधीक्षक सीताराम शर्मा ने जेल का माहौल बदला, लोगों की सोच बदली..!
गाजियाबाद।पूर्व में करीब तीन साल में अपनी बेहतरीन परफॉर्मेंस देकर मुजफ्फरनगर जैसी जेल को सुदरात्मक बनाने वाले नायक के रूप में जाने जाने जाने वाले सीताराम शर्मा जब यहां से गाजियाबाद की जेल अधीक्षक बनाए गए तो उन्होंने अपने लगभग 2 साल के कार्यकाल में जेल अधीक्षक सीताराम शर्मा ने बहुत से आयाम स्थापित करने का काम किया।करीब 2 साल में गाजियाबाद जेल लाजवाब हो गई है, सीताराम शर्मा के बेहतर कामों की जितनी चर्चा की जाए कम है, सबसे पहले सीताराम शर्मा ने बड़े बदमाशों और माफियाओं के कुचक्र को तोडा इससे अन्य बंदियों में संदेश यही जाता है कि बड़े माफिया बड़े बदमाश की बात अलग होती है । और बहुत बड़ी संख्या में बंदी इनसे प्रभावित होने लगते हैं और इनमें कुछ इन गुरुओं के चेले बनकर फिर अपराध की और अग्रसर हो जाते हैं लेकिन सीताराम शर्मा ने इसी असमानता पर प्रहार करते हुए जेल में सभी बंदियों को एक समान बनाने की कोशिश की है, माफिया राज की उस सोच को तोड़ा है छिन्न-भिन्न किया है, कोई किसी भी का रोल मॉडल नहीं है, सब एक समान एक कतार में खड़े होकर जेल के नियमों और अनुशासन का पालन करते हैं।गाजियाबाद जेल में यही सबसे बड़ा काम हुआ है कि सभी बंदी एक समान भावना से रहते हैं, अब जेल में जेल का अनुशासन चलता है, नियमों से काम होता है। बड़े बदमाशों की बड़ी सोच का प्रभुत्व एवं तिलिस्म टूटा हुआ है, जिसका परिणाम यह रहा है कि सीताराम शर्मा के प्रयासों एवं सुधारगरो से बंदियों ने अपने जीवन के आगे की संभावनाओं को तेजी के साथ तलाशने का काम शुरू किया, माफिया मुक्त होकर बंदी अपने जीवन एवं कल्याण पर ध्यान केंद्रित करते हुए नजर आ रहे हैं जो बंदी जीवन में जो कुछ बेहतर करना चाहता था अब जेल में रहकर वही काम और वही प्रयास बखूबी कर रहा है, जो बंदी अनपढ़ था वह पढ़ने की कोशिश कर रहा है तथा बाहर निकलकर अपने भविष्य की ओर देख रहा है, निरक्षर से साक्षर बनने की मुहिम का हिस्सा ऐसे बंदी बड़ी संख्या में बन रहे हैं जो काम बचपन में हालातों के चलते नहीं कर पाए उस काम को अब जेल के अंदर रहकर पूरा कर रहे हैं और उन सपनों को पूरा करने का प्रयास हो रहा है जो कभी उन्होंने या उनके परिवार के लोगों ने देखा था! बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी आकर बंदियों को साक्षर बनाने का काम कर रहे हैं, बखूबी पाठशाला चल रही है स्कूल कॉलेज के बच्चे जाकर जेल का निरीक्षण कर रहे हैं खुश हो रहे हैं पाठशाला की उपाधि दे रहे हैं अभिभावक भी खुश नजर आते हैं, जो बच्चे कभी जेल के नाम से डरते थे वो अब पाठशाला का रूप बताते हैं, जेल देखकर इतराते हैं खुश होकर तालियां बजाते हैं अल्लहड स्वभाव में खुशी में चिल्लाते हैं, बच्चों का मन जेल जाकर पूरा हरा भरा हो जाता है वह बाहर आकर बार-बार यही कहते हैं कि हम बार-बार इस जेल को देखना चाहते हैं! लाइब्रेरी में बैठकर बंदी पढ़ते हैं महापुरुषों की जीवनी ओर प्रेरणा लेकर अच्छे और नेक इंसान बनना चाहते हैं, अपराध से नाता तोड़कर मुख्य धारा समाज में आने को तत्पर रहते हैं, धर्म कर्म की पुस्तक पढ़कर आध्यात्मिक की तरफ जाते हुए दिखाई देते हैं, सोच बदल रही है। लाइब्रेरी को बनाने से पूर्व यही सोच सीताराम शर्मा की भी थी कि बदलाव होना चाहिए और बदलाव होता दिखाई दे रहा है, सीताराम शर्मा ने जेल के बंदियों को योग की तरफ ले जाने का काम बखूबी किया है, जेल में योगा टीम तैयार की गई जो भी बंदी योग करना चाहते थे उन्हें योग सिखाना शुरू किया गया, शुरू में योग गुरुओं की मदद से योग सिखाया जाता था बाद में बंदी इतने निपुण हुए कि अब खुद अन्य बंदियों को भी सीखने का काम कर रहे हैं, योग के पीछे भी सीताराम शर्मा की यही सोच रही कि मनुष्य स्वस्थ रहेगा तो जीवन में कुछ भी बेहतर ढंग से कर सकेगा, जेल में रहकर बंदी आलस्य में आ जाते हैं लेकिन योग करके वे स्वस्थ होने के साथ तनाव मुक्त रहते हैं तथा तनाव मुक्त जीवन अच्छी सोच को बढ़ावा देता है, सकारात्मकता की दिशा में मनुष्य आगे बढ़ता है। साथ ही जेल में भजन एवं गायक मंडली भी बनाई गई जो कारागार में समय-समय पर कार्यक्रम आयोजित कर बंदियों को आध्यात्मिक की तरफ लेकर जाती है, सत्संग भजनों की धारा बहती है, बंदी इसका पूरा लाभ ले रहे हैं! जेल का माहौल बदला है, लोगों की सोच बदली है! बंदियों में मानसिक बौद्धिक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है यह परिवर्तन ही उनको मुख्य धारा समाज में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जेल में बंदी को दंड देना, सजा भुगतना या सजा काटकर बाहर आना मुख्य उद्देश्य नहीं है बल्कि जेल में रहकर अपने गुनाह अपराध मनोवृति विकृत सोच को बदलकर मुख्य धारा में वापस आएं, एक आम नागरिक की भांति बेहतर जिंदगी जिएं और राष्ट्रहित में किसी ने किसी रूप में अपना योगदान दें! जेल में बंदियों के साथ बेहतर व्यवहार होगा सुधार की प्रक्रिया होगी, धर्म-कर्म का एहसास कराया जाएगा, स्वस्थ जीवन जिएगा अपने को बदलेगा और फिर बाहर आएगा तो सुधार की प्रक्रिया का अर्थ तभी पूरा होगा! जेल में रहकर समय काटकर, गलत सोच स्वभाव के साथ बाहर आ जाना भी किसी समस्या का हल नहीं है! जीवन को जीना सीखें, समाज और राष्ट्र का महत्व समझे, मानवीय मूल्यों की कदर करें, जीवन में पूरी तरह बदलाव करें तभी जेल की बंदी सुधार ग्रह की परिभाषा को बेहतर ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा!गाजियाबाद जेल में बंदियों में बदलाव और सुधार की प्रक्रिया बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ी है, नशा करना अपराधि एक चर्चा करना, झगड़ालू स्वभाव बनाए रखना जीवन नहीं है, समय काटना हल नहीं है, बल्कि एक लक्ष्य के साथ जीना ही जीवन है, यही सब कुछ बताया गया समझाया गया और जीवन में उतारा गया!गाजियाबाद जेल का आज बंदियों के हित में यही मुख्य योगदान है! धार्मिक गुरुओं, सामाजिक एवं प्रतिष्ठित गणमान्य लोगों ने जेल में यही सीखने और बताने का प्रयास किया कि जीवन अमूल्य है इसे बेहतर काम में लगाओ और अपने जीवन को एक उदाहरण बनाओ सीताराम शर्मा के प्रयासों से यही सब कुछ हुआ है। सीताराम शर्मा ने जेल की दीवारों, खान-पान गुणवत्ता, खूबसूरती, सौंदर्य करण पर भी विशेष ध्यान ही नहीं दिया बल्कि मूल मनोवृति में बदलाव पर बड़ा काम किया है और इसमें वह काफी हद तक सफल रहे हैं, अपराध की और भटके और बहके हुए व्यक्तियों को उन्होंने सही मार्ग पर लाने की कोशिश की है, उदाहरण के तौर पर मैं फिर कहना चाहूंगा कि जो नशा, परिवार और समाज नहीं छुड़ा पाता वह नशा जेल में छुड़वाने का काम बखूबी किया गया है, जेल को नशा मुक्त बनाने के प्रयास सार्थक हुए हैं गाजियाबाद जेल में माहौल ऐसा बदला हुआ है कि सभी बंदी बहुत खुश नजर आते हैं पूरा स्टाफ बिना किसी तनाव के अपनी सेवाओं को सराहनीय के रूप में अंजाम दे रहा है, जीवन जीने की कला अगर देखनी हो तो गाजियाबाद जेल में देखी जा सकती है जहां पर बंदियों ने अपने जीवन में सुधार किया है, व्यवहार को बदला है स्कूल के बच्चों या संस्थाओं के सदस्यों ने जेल में जाते हुए अंदर की आबो हवा देखकर कहा है कि वाकई में यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है, यह बदलाव ही तो है जो आज सुधार की एक सशक्त उदाहरण बनी हुई है, जेल के आसपास मरघाटी सन्नाटा नहीं बल्कि खूबसूरत नजारा है, हरियाली और पेंटिंग सकारात्मक का संदेश देती है, जेल परिसर में जेल परिवार के सदस्य एवं बच्चे घूमने से बचते डरते थे आज अटखेलिया एवं मनोरंजन करते हुए कूदते फांदते नजर आते हैं, खुशियां लौटी है। कभी किसी ने भी नहीं सोचा था कि गाजियाबाद जेल के बंदी सुधार की दिशा में इस प्रकार आगे बढ़ते हुए अपने जीवन को एक लक्ष्य बना लेंगे, जेल में ट्रेनिंग और सर्टिफिकेट पाने के बाद बंदी अपने स्वरोजगार तलाश रहे हैं, ऐसे बंदियों ने जेल में समय का सदुपयोग करते हुए सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से ट्रेनिंग लेकर अपने काम को करना प्रारंभ किया है, अपने रोजगार के रास्ते खुद खोले हैं। यह एक बड़ा बदलाव एक क्रांतिकारी कदम कहा जा सकता है कि गाजियाबाद जेल के बंदी पूरी तरह सुधरकर तथा बाहर आकर अपनी छवि एवं काम के आधार पर खुद को स्थापित कर रहे हैं! इसके पीछे सीताराम शर्मा का यही प्रयास रहा है की जेल से बाहर आने के बाद अपराध की सोच एवं दलदल से कोसों दूर रहकर बंदी अपने रोजगार के बारे में सोचें वह जेल में बिताये वक्त से सीखा हुआ अनुभव और सर्टिफिकेट उनके काम आए इस दिशा में उन्होंने सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से कुछ बंदियों को रोजगार दिलाने की जोरदार मुहिम शुरू की है जिसको काफी सराहा जा रहा है, साथ ही नौकरी दिलाने के प्रयास भी बहुत ही प्रभावी कहे जा सकते हैं इसके बहुत ही अच्छे परिणाम रहे हैं, और भविष्य में बंदियों के कल्याण एवं पुनर्वास की दिशा में यह एक बहुत ही सार्थक प्रभावी पहल हो सकती है और पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसी पहल को शुरू किया जाना बहुत ही जरूरी और आवश्यक महसूस हो रहा है!!












