उरुवा बाल विकास परियोजना में ‘सुविधा शुल्क’ की गूंज: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का फूटा आक्रोश, विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

उरुवा बाल विकास परियोजना में ‘सुविधा शुल्क’ की गूंज: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का फूटा आक्रोश, विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

सात माह तक निरीक्षण व्यवस्था रही निष्क्रिय, अचानक कार्रवाई से मचा हड़कंप; रजिस्टर जमा कराने, मानदेय प्रभावित करने और कथित दबाव बनाने के आरोपों ने बढ़ाई जांच की मांग

मेजा (प्रयागराज)। प्रदेश में सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावों के बीच प्रयागराज जनपद के मेजा तहसील अंतर्गत उरुवा ब्लॉक की बाल विकास परियोजना इन दिनों गंभीर आरोपों के कारण चर्चा के केंद्र में आ गई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों ने न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं, बल्कि उन व्यवस्थाओं की भी पोल खोलने का काम किया है जिनके माध्यम से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।

उरुवा बाल विकास परियोजना कार्यालय से जुड़ा यह मामला धीरे-धीरे क्षेत्रीय स्तर से निकलकर जनचर्चा का विषय बनता जा रहा है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभागीय निरीक्षण और प्रशासनिक कार्रवाई की आड़ में कथित रूप से सुविधा शुल्क की व्यवस्था विकसित कर दी गई है। आरोपों के अनुसार जो कार्यकर्ता कथित मांगों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई का दबाव बनाया जा रहा है।

सात माह तक नहीं हुई सुध, फिर अचानक सक्रिय हुआ निरीक्षण तंत्र

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन केंद्रों पर अब कमियों का हवाला दिया जा रहा है, वहां पिछले कई महीनों से विभागीय निगरानी क्यों नहीं की गई। कार्यकर्ताओं का दावा है कि लगभग सात माह तक अधिकांश केंद्रों पर नियमित निरीक्षण नहीं हुआ। इस दौरान न तो किसी प्रकार की समीक्षा बैठक प्रभावी रूप से आयोजित की गई और न ही कमियों को दूर करने के लिए कोई विशेष निर्देश दिए गए।

लेकिन अचानक निरीक्षण अभियान शुरू होने के बाद कई केंद्रों पर पहुंची विभागीय टीमों ने रिकॉर्ड, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों की जांच की। इसके बाद कई कार्यकर्ताओं के रजिस्टर जमा करा लिए गए। इस कार्रवाई ने कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस और भय का माहौल पैदा कर दिया।

रजिस्टर जब्ती से बढ़ी बेचैनी, मानदेय को लेकर भी आशंका

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि रजिस्टर उनके दैनिक कार्यों का आधार होते हैं। इन्हीं अभिलेखों के माध्यम से बच्चों के पोषण, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की देखरेख और सरकारी योजनाओं की प्रगति का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है।

ऐसे में बड़ी संख्या में रजिस्टर कार्यालय में जमा कराए जाने से कार्यकर्ताओं के सामने कार्य संचालन की समस्या खड़ी हो गई है। कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें यह संकेत दिया गया कि यदि कथित सुविधा शुल्क की व्यवस्था नहीं की गई तो उनके मानदेय भुगतान में भी बाधा उत्पन्न हो सकती है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन चर्चाओं ने पूरे क्षेत्र में असंतोष का वातावरण बना दिया है।

क्या निरीक्षण व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विभागीय अधिकारी और सुपरवाइजर नियमित रूप से केंद्रों का निरीक्षण करते, समय-समय पर कमियों की जानकारी देते और सुधार के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते, तो आज ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि निरीक्षण का उद्देश्य दंडात्मक कार्रवाई नहीं बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए। यदि लंबे समय तक निगरानी तंत्र निष्क्रिय रहे और फिर अचानक कठोर कार्रवाई शुरू हो जाए तो इससे पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जनकल्याणकारी योजनाओं पर पड़ सकता है असर

बाल विकास परियोजना केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं, बल्कि लाखों बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यवस्था है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से कुपोषण नियंत्रण, टीकाकरण जागरूकता, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा जैसी योजनाएं संचालित की जाती हैं।

यदि परियोजना स्तर पर भ्रष्टाचार, दबाव या सुविधा शुल्क जैसी शिकायतें सही साबित होती हैं, तो इसका सीधा प्रभाव उन लाभार्थियों पर पड़ेगा जिनके लिए यह पूरी व्यवस्था बनाई गई है। यही कारण है कि मामला केवल विभागीय विवाद तक सीमित न रहकर जनहित से जुड़ा विषय बन गया है।

कार्यकर्ताओं में बढ़ रहा असंतोष

सूत्रों के अनुसार कई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता खुलकर सामने आने से बच रहे हैं, लेकिन उनके बीच असंतोष लगातार बढ़ रहा है। उनका कहना है कि सीमित मानदेय पर कार्य करने के बावजूद उन्हें अनावश्यक दबाव और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है।

कई कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि यदि विभागीय कार्रवाई नियमों के तहत की जा रही है तो उसे पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की भ्रम या आशंका की स्थिति न बने।

जांच से ही सामने आएगी सच्चाई

पूरा मामला अब निष्पक्ष जांच की मांग तक पहुंच चुका है। सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिला प्रशासन तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।

यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए और यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे न केवल विभाग की विश्वसनीयता बनी रहेगी बल्कि सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं पर लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा।

सबकी नजरें प्रशासनिक कार्रवाई पर

फिलहाल उरुवा बाल विकास परियोजना में उठे इस विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सात माह तक निष्क्रिय रही निरीक्षण व्यवस्था, अचानक शुरू हुई कार्रवाई, रजिस्टर जमा कराने की प्रक्रिया और सुविधा शुल्क के आरोपों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाता है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक यह मामला उरुवा ब्लॉक ही नहीं बल्कि पूरे जिले में चर्चा और बहस का विषय बना रहेगा।

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