प्रतापगढ़।सई नदी में जलकुंभी का बढ़ता प्रकोप, जलीय पारिस्थितिकी पर मंडरा रहा खतरा
संवाददाता विनय कुमार मिश्रा
प्रतापगढ़। जनपद की जीवनदायिनी एवं वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्यंदिका (आधुनिक सई) नदी में जलकुंभी का प्रकोप तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। बेल्हा मुख्यालय स्थित बेल्हा घाट पर नदी की सतह जलकुंभी से लगभग पूरी तरह ढक गई है, जिससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।विशेषज्ञों के अनुसार जलकुंभी एक अत्यंत आक्रामक जलीय पौधा है, जो तेजी से फैलकर पानी की सतह को ढक देता है। इससे सूर्य का प्रकाश पानी के भीतर नहीं पहुंच पाता, घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घटती है और मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों का जीवन प्रभावित होता है। साथ ही नौकायन, सिंचाई और जल निकासी जैसी गतिविधियां भी बाधित होती हैं।प्रतापगढ़ में लगभग 72 किलोमीटर तक बहने वाली सई नदी के लिए जलकुंभी का यह बढ़ता प्रसार चिंता का विषय बन गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते इसके नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो नदी की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।जलकुंभी के नियंत्रण के लिए यांत्रिक, जैविक और आवश्यकता पड़ने पर वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप रासायनिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इन तरीकों के समन्वित उपयोग से जलकुंभी के प्रसार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।स्थानीय लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभागों से सई नदी में फैली जलकुंभी को हटाने तथा नदी के संरक्षण के लिए शीघ्र अभियान चलाने की मांग की है।
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