सीतापुर में डॉक्टर की डिग्री और रजिस्ट्रेशन को लेकर उठे गंभीर सवाल, स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर भी निशाना
संवाददाता — निशांत त्रिपाठी सीतापुर। जिले में कई निजी अस्पतालों में सेवाएं देने वाले डॉक्टर तौसीफ इलाही की शैक्षणिक योग्यता और चिकित्सा रजिस्ट्रेशन को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। सामने आए कुछ दस्तावेजों में अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग चिकित्सा डिग्री और रजिस्ट्रेशन नंबर दर्ज होने का दावा किया गया है। हालांकि, इन दस्तावेजों की संबंधित विश्वविद्यालयों और मेडिकल काउंसिल से आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
बताया जा रहा है कि वर्ष 2016 के दस्तावेजों में डॉक्टर के नाम के साथ एलोपैथिक डिग्री MBBS का उल्लेख है। वहीं वर्ष 2019 में वाराणसी विश्वविद्यालय से BMS (आयुष) किए जाने का दावा सामने आया है, जिसके साथ रजिस्ट्रेशन नंबर 326051 दर्ज बताया गया है। वर्ष 2020 के एक कथित शपथ पत्र में भी BMS डिग्री होने का दावा किया गया है। इसके अलावा वर्ष 2022 में स्वयं को सर्जन काउंसलर के रूप में दर्शाए जाने और रजिस्ट्रेशन नंबर 50644 इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है।

एक ही व्यक्ति के नाम से अलग-अलग समय पर अलग-अलग चिकित्सा योग्यताओं और रजिस्ट्रेशन का उल्लेख सामने आने के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि संबंधित दस्तावेज वास्तविक हैं या नहीं और यदि वास्तविक हैं तो इनके आधार पर किस चिकित्सा पद्धति में सेवाएं देने की अनुमति प्राप्त थी।
सूत्रों के मुताबिक, डॉक्टर की कथित डिग्रियां और प्रमाणपत्र सीतापुर के कुछ निजी अस्पतालों एवं क्लीनिकों में प्रदर्शित किए जाने की बात भी सामने आई है। ऐसे में मामला सीधे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ जाता है। यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार की जालसाजी या गलत जानकारी की पुष्टि होती है तो यह गंभीर कानूनी मामला हो सकता है।
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। अस्पतालों के पंजीकरण अथवा नवीनीकरण के दौरान संबंधित चिकित्सकों की शैक्षणिक योग्यता और रजिस्ट्रेशन का सत्यापन किस स्तर पर किया गया? क्या संबंधित मेडिकल काउंसिल और विश्वविद्यालयों से प्रमाणपत्रों का क्रॉस-वेरिफिकेशन कराया गया था? यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
फिलहाल पूरे मामले में आधिकारिक जांच और दस्तावेजों के सत्यापन का इंतजार है। संबंधित विश्वविद्यालयों, चिकित्सा परिषदों और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।
अब निगाहें सीतापुर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच में दस्तावेज फर्जी या गलत पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्ति और जिम्मेदार संस्थानों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की मांग उठना तय माना जा रहा है।













