न्याय की जीत: 22 साल लंबे संघर्ष के बाद छलके बेटियों के आंसू, AFT लखनऊ का ऐतिहासिक फैसला
मां के सपनों को बेटियों ने दिया मुकाम, 22 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार मिला शहीद के परिवार को हक
हक की आवाज: फर्रुखाबाद से लखनऊ तक का पथरीला सफर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद से उठी न्याय की पुकार ने आखिरकार व्यवस्था के बंद दरवाजों को तोड़ दिया। पूरे 22 वर्षों के लंबे, पथरीले और थका देने वाले कानूनी संघर्ष के बाद सशस्त्र बल अधिकरण (AFT), क्षेत्रीय पीठ लखनऊ ने एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने दिवंगत सैनिक की बेटियों को उनकी दिवंगत मां का वाजिब हक और सम्मान लौटाया। इस जटिल मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने प्रभावी पैरवी की।
देशसेवा का जज्बा और व्यवस्था की बेरुखी
फर्रुखाबाद निवासी पूर्व नायक (दिवंगत) श्रीकृष्ण ने वर्ष 1962 में भारतीय सेना में भर्ती होकर 1977 तक मां भारती की निस्वार्थ सेवा की थी। इसके उपरांत वे पुनः ‘डिफेंस सिक्योरिटी कॉर्प्स’ (DSC) के माध्यम से देशसेवा में समर्पित हुए।
3 मार्च 2001 को मिलिट्री अस्पताल, ग्वालियर में सेवा के दौरान अत्यधिक मानसिक तनाव और कठिन परिस्थितियों के कारण ‘सेरेब्रोवैस्कुलर एक्सीडेंट और हाइपरटेंशन’ से उनका निधन हो गया। देश के इस वीर के जाने के बाद रक्षा लेखा प्रधान नियंत्रक (PCDA) इलाहाबाद और मेडिकल बोर्ड ने बिना किसी ठोस कारण के उनकी मृत्यु को सैन्य सेवा से असंबद्ध (NANA) करार दे दिया और उनकी पत्नी को ‘विशेष परिवार पेंशन’ देने से साफ इंकार कर दिया।
’मां की आंखों के सपने ओझल हुए, पर बेटियों ने उठाई मशाल’
पति के सम्मान और हक के लिए वीरांगना कमला देवी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अकेले ही अदालतों के चक्कर काटे और AFT लखनऊ का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, न्याय की राह इतनी लंबी साबित हुई कि 22 साल तक संघर्ष करते-करते 17 अक्टूबर 2023 को मुकदमे के विचाराधीन रहने के दौरान ही कमला देवी दुनिया को अलविदा कह गईं।
मां के निधन के बाद उनकी दोनों बेटियों—नीरू गंगवार और सोनी सिंह—ने मां के आंसुओं का मान रखने की कसम खाई। बेटियों ने हिम्मत न हारते हुए अदालत में अपनी मां की जगह कानूनी वारिस (Legal Heirs) के रूप में कमान संभाली और अंतिम सांस तक लड़ाई जारी रखी।
अदालत का कड़ा रुख और ऐतिहासिक आदेश
अधिकरण के न्यायमूर्ति सुरेश कुमार गुप्त एवं मेजर जनरल संजय सिंह की पीठ ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए कड़ा रुख अपनाया:
चिकित्सकीय लापरवाही पर टिप्पणी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल बोर्ड का बिना किसी ठोस वजह के बीमारी को ‘संवैधानिक’ बताना कानूनन गलत है। लंबे सैन्य जीवन का तनाव ही मृत्यु का मुख्य कारण था।
ड्यूटी का सिद्धांत: सैनिक जब सेवा में रहते हुए अस्पताल में भर्ती हुए, तो उन्हें ऑन-ड्यूटी ही माना जाएगा।
बकाये का भुगतान: कोर्ट ने आदेश दिया कि स्वर्गीय कमला देवी की दोनों बेटियों को जनवरी 2020 से अक्टूबर 2023 तक का बकाया ‘विशेष परिवार पेंशन’ (Life Time Arrears) 6% वार्षिक ब्याज के साथ 4 महीने के भीतर बराबर-बराबर हिस्सों में अदा किया जाए।
”यह लड़ाई पैसों की कभी थी ही नहीं, यह हमारे पिता के समर्पण और हमारी मां के आत्मसम्मान की लड़ाई थी। आज भले ही हमारी मां यह दिन देखने के लिए हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अदालत के इस फैसले ने उनकी आत्मा को शांति दी है और उनके 22 सालों के तप को सार्थक कर दिया है।”











