गोरखपुर एम्स की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल: निदेशक को खुद जाना पड़ा निजी अस्पताल
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के सीमांत जिलों के लाखों मरीजों के लिए स्वास्थ्य का बड़ा केंद्र बने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर की चिकित्सा व्यवस्था इस समय बड़े सवालों के घेरे में है। हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने संस्थान के दावों और सुविधाओं की पोल खोल कर रख दी है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गोरखपुर एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता अचानक बीमार हो गईं। उन्हें इलाज के लिए एम्स में ही भर्ती कराया गया, लेकिन अस्पताल परिसर में ‘कैथ लैब’ की सुविधा उपलब्ध न होने के कारण उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें एक निजी अस्पताल का रुख करना पड़ा। निदेशक महोदया को खुद लगभग आधे घंटे तक निजी अस्पताल के दरवाजे पर रहना पड़ा और उपचार के लिए बाहर जाना पड़ा। इस घटना ने संस्थान की आंतरिक चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
सात साल बाद भी कैथ लैब न होना चिंता का विषय
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस एम्स की स्थापना को सात वर्ष बीत चुके हैं, वहाँ आज तक हृदय रोगों के इलाज के लिए बेहद जरूरी ‘कैथ लैब’ जैसी बुनियादी सुविधा क्यों नहीं शुरू की जा सकी है? जब संस्थान की निदेशक को ही आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए निजी अस्पताल का सहारा लेना पड़े, तो आम और गंभीर रूप से बीमार मरीजों की दुर्दशा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।
आज भी गंभीर हालत में एम्स पहुँचने वाले कई मरीजों को बाहर के अस्पतालों में रेफर करने की मजबूरी बनी हुई है। इस घटना के बाद से आम जनता और बुद्धिजीवियों में स्वास्थ्य प्रशासन के प्रति भारी नाराजगी है, और लोग एम्स प्रबंधन से जल्द से जल्द सभी आधुनिक चिकित्सा उपकरण और सुविधाएँ सुनिश्चित करने की माँग कर रहे हैं।











