नशे में डूबता समाज: शराब से टूटते घर, बिखरते रिश्ते

शराब से समाज में बढ़ रही हिंसा, गरीबी और रिश्तों की टूटन। जानिए कैसे यह नशा हमारे गांवों और परिवारों को अंदर से खोखला कर रहा है।

शराब, जिसे आम बोलचाल में नशा या दारू कहा जाता है, आज हमारे समाज की एक गंभीर समस्या बन चुकी है। यह सिर्फ एक बोतल में बंद पेय नहीं, बल्कि अनेक परिवारों के टूटने, हिंसा फैलने और युवा पीढ़ी के बर्बाद होने का प्रमुख कारण बन गया है। खासकर गांवों और कस्बों में शराब का प्रसार एक सामाजिक बुराई का रूप ले चुका है।

आज गांव की गलियों में शाम होते ही शराब के ठेके सज जाते हैं। मजदूरी करने वाला व्यक्ति, जो दिन भर मेहनत कर दो पैसे कमाता है, वही पैसे शाम को शराब में उड़ा देता है। इसका असर सिर्फ उसकी सेहत पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे परिवार पर होता है। बच्चों की पढ़ाई, घर की रोटी और महिलाओं की सुरक्षा — सब कुछ दांव पर लग जाता है।

शराब के कारण घरेलू हिंसा में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। नशे में चूर पति जब घर लौटता है, तो गाली-गलौज, मारपीट और अपमान जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। महिलाएं चुपचाप सहन करती हैं, क्योंकि उनके पास न तो आवाज़ उठाने की ताक़त है और न ही कोई विकल्प। बच्चों के मन में डर और तनाव घर कर जाता है, जिससे उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है।

सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण भी शराब है। शराब पीकर गाड़ी चलाना जानलेवा साबित होता है, लेकिन आज भी लोग लापरवाह बने हुए हैं। कई घटनाओं में निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, और अपराधी अक्सर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं।

सबसे विडंबना की बात यह है कि सरकारें शराब पर प्रतिबंध लगाने के बजाय उससे मिलने वाले राजस्व पर निर्भर हैं। शराब की बिक्री से सरकार को हजारों करोड़ की कमाई होती है, इसलिए कई बार सामाजिक नुकसान को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कुछ राज्य शराबबंदी की कोशिश करते हैं, पर बिना समाज के सहयोग के यह सफल नहीं हो पाती।

नशे में डूबता समाज: शराब से टूटते घर, बिखरते रिश्ते
नशे में डूबता समाज: शराब से टूटते घर, बिखरते रिश्ते

समाधान की बात करें तो शराबबंदी केवल कानून से नहीं हो सकती। इसके लिए समाज को भी जागरूक होना होगा। गांवों में नशा मुक्ति अभियान चलाने होंगे, युवाओं को खेल, शिक्षा और रोजगार की ओर प्रेरित करना होगा। पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।

शराब से न सिर्फ शरीर कमजोर होता है, बल्कि समाज भी भीतर से टूटता है। हमें यह तय करना होगा कि हम नशे के गुलाम रहना चाहते हैं या एक स्वस्थ, सशक्त और संस्कारी समाज बनाना चाहते हैं।

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