श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाई गई विश्वकर्मा पूजा, तकनीकी कौशल के साथ आस्था का मिलन

जनपद में श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाई गई विश्वकर्मा पूजा, तकनीकी कौशल के साथ आस्था का मिलन।

संवाददाता करन कुमार विश्वकर्मा  प्रतापगढ़। आपको बता दें कि जनपद प्रतापगढ़ में मांधाता बाजार नगर पंचायत के वार्ड नंबर 13 मांधाता थाने के पीछे “विश्वकर्मा नगर” में विश्वकर्मा पूजा का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया गया। इसके अलावा आपको बताते चलें कि देशभर में आज देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की जयंती धूमधाम से मनाई गई। साथ ही इस शुभ अवसर पर कारखानों, कार्यस्थलों और औद्योगिक संस्थानों में विशेष पूजा-अर्चना की गई। कारीगरों, इंजीनियरों, शिल्पकारों और मशीनों से जुड़े लोगों ने भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा की।

साथ ही विश्वकर्मा पूजा के मौके पर श्रमिकों और कारीगरों ने अपने औजारों और मशीनों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा की। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से काम में तरक्की और उन्नति मिलती है। इस दिन मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और लोग पूरे दिन पूजा-अर्चना में व्यस्त रहते हैं।

शोभायात्राओं का आयोजन—

कई शहरों में भगवान विश्वकर्मा की भव्य शोभायात्राएं निकाली गईं। इन शोभायात्राओं में सजी हुई झांकियां, रंग-बिरंगे परिधान पहने लोग और बैंड-बाजे शामिल थे, जो उत्सव के माहौल को और भी जीवंत बना रहे थे। इन शोभायात्राओं का जगह-जगह भव्य स्वागत किया गया और भक्तों ने भगवान का पूजन किया। इसके अलावा आपको बताते चलें कि इस अवसर पर, पारंपरिक कारीगरों के लिए शुरू की गई ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ पर भी विशेष ध्यान दिया गया। इस योजना के तहत, कारीगरों को उनके हुनर को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर बनने में मदद की जा रही है।

पौराणिक महत्व—

आपको बता दें कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने ही देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, महल और रथों का निर्माण किया था। सोने की लंका, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी और इंद्रप्रस्थ जैसे महान नगरों के निर्माण का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है। यही कारण है कि उन्हें सृष्टि का प्रथम इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है।

कन्या संक्रांति पर मनाया जाता है यह उत्सव—-

आपको बता दें कि विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य ग्रह कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। यह तिथि हर साल 17 सितंबर को ही पड़ती है। इस प्रकार यह पर्व तकनीकी कौशल और कड़ी मेहनत के सम्मान का प्रतीक है।

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