शादी में खुशी कम, गैस सिलेंडर की टेंशन ज्यादा — बाजार में ‘मौका’ बना संकट
रिपोर्ट: संतोष यादव,
शादियों का सीजन पूरे शबाब पर है। बैंड-बाजा, बारात और दूल्हा-दुल्हन की मुस्कान से ज्यादा इस बार चर्चा किसी और चीज़ की हो रही है—गैस सिलेंडर की। जिस घर में शादी है, वहां सबसे बड़ी चिंता अब मेहमानों की आवभगत नहीं, बल्कि रसोई के लिए सिलेंडर जुटाने की हो गई है। सिलेंडर लेने की प्रक्रिया भी किसी प्रतियोगिता से कम नहीं रह गई है। डीलर के पास जाइए तो जवाब मिलता है—“पहले कलेक्टर से अनुमति लाकर दिखाइए।” कलेक्टर कार्यालय पहुंचिए तो शादी का कार्ड, पहचान पत्र, तारीख और पूरा ब्यौरा देना पड़ता है। इसके बाद भी जरूरत 20 सिलेंडर की हो तो “आशीर्वाद” स्वरूप 2-3 सिलेंडर ही मिल पाते हैं। बाकी की व्यवस्था बाजार अपने तरीके से कर देता है। जहां सामान्य कीमत लगभग 2000 रुपये है, वहीं जरूरतमंदों को यही सिलेंडर 4000 से 5000 रुपये में मिल रहा है। यानी शादी का बजट अब खाने-पीने से ज्यादा गैस के इंतजाम पर खर्च हो रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि शादी में मेहमानों से ज्यादा महत्व गैस सिलेंडर का हो गया है। कहने को यह संकट है, लेकिन असल में कई लोगों के लिए यह कमाई का सुनहरा अवसर बन चुका है।
दूल्हा-दुल्हन खुश हैं या नहीं, इससे किसी को खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन इतना तय है कि इस शादी सीजन में सबसे ज्यादा खुश अगर कोई है, तो वो हैं—गैस सिलेंडर बेचने वाले।












