पीस कमेटी या ‘पीस-पीस’ कुर्सियां? अवागढ़ में 12 लोग पहुंचे, 88 कुर्सियां बोलीं — हमसे ही बात कर लो!
संवाददाता योगेन्द्र सिंह
एटा (अवागढ़)। जनपद एटा के अवागढ़ कोतवाली परिसर में आज एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसे लोग “शांति का चरम” भी कह सकते हैं और “व्यवस्था की विडंबना” भी। अतिक्रमण जैसे गंभीर मुद्दे पर बुलाई गई पीस कमेटी की बैठक इतनी शांतिपूर्ण रही कि खुद शांति भी कन्फ्यूज हो गई—“मीटिंग चल रही है या स्थगित हो चुकी है?” बताया जा रहा है कि बैठक के लिए पूरे इंतज़ाम किए गए थे—करीब 100 कुर्सियां सजीं, लेकिन उन पर बैठने के लिए केवल 12 लोग ही पहुंचे। इनमें से भी कुछ “स्थानीय प्रतिनिधि” थे, जबकि बाकी की पहचान बैठक खत्म होने तक भी उतनी ही रहस्यमयी रही जितनी खाली कुर्सियों की मौजूदगी। वहीं, खाली पड़ी कुर्सियां पूरे अनुशासन में लाइन से बैठी रहीं और मानो आपस में फुसफुसा रही हों—
“आज मीटिंग है या हमारी परेड?”
एक कुर्सी तो जैसे तंज कसते हुए कह रही थी—“हम तो टाइम पर आ गए, इंसान ही लेट हो गए… या आए ही नहीं!” अतिक्रमण जैसे अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाई गई इस बैठक में मौजूद गिने-चुने लोगों ने अपनी बात रखी, लेकिन माहौल ऐसा था मानो “जनसंवाद” की जगह “कुर्सी-संवाद” ज्यादा प्रभावी हो। स्थानीय लोगों में इस बैठक को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ का कहना है कि “अगर सूचना सही तरीके से दी जाती, तो शायद कुर्सियों को अकेले ड्यूटी न करनी पड़ती।” तो वहीं कुछ लोगों ने इसे प्रशासनिक औपचारिकता बताते हुए कहा—“मीटिंग तो हो गई, अब रिपोर्ट भी बन जाएगी… कुर्सियों के नाम से!” फिलहाल, अवागढ़ की इस “अल्ट्रा-शांत” पीस कमेटी बैठक ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है क्या ऐसी बैठकों का मकसद सिर्फ औपचारिकता निभाना रह गया है, या वाकई जनभागीदारी की जरूरत को समझा जाएगा?












