“खेल के मैदान में लापरवाही की इनिंग्स: केडी सिंह बाबू स्टेडियम को संजीवनी की दरकार”
स्टेट संवाददाता विष्णु रावत लखनऊ: शहर के दिल में धड़कता केडी सिंह बाबू स्टेडियम, जो कभी उत्तर भारत की खेल शान हुआ करता था, आज बदहाली और बेरुखी की बेमिसाल मिसाल बनकर रह गया है। जहां कभी राष्ट्रीय और अंतरराज्यीय प्रतियोगिताओं की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब जंग खाए एसी, पानी से भरे कोर्ट और टूटी बेंचें खेल प्रेमियों के जज़्बे का माखौल उड़ा रही हैं।
बच्चे खेल रहे हैं जज़्बे से, सिस्टम खेल रहा है लापरवाही से
शहर के बीचों-बीच स्थित इस स्टेडियम में आज भी बच्चों की आंखों में सपने हैं और पैरों में जुनून। कोई हॉकी स्टिक थामे गोल दागने की कोशिश में है, तो कोई फुटबॉल को लक्ष्य की ओर मोड़ रहा है। क्रिकेट की पिच पर भी उम्मीदें दौड़ रही हैं। मगर इस जुनून के इर्द-गिर्द खस्ताहाल व्यवस्थाओं की दीवारें खड़ी हैं, जो हर दिन इन सपनों को चोट पहुँचा रही हैं।
मरम्मत के नाम पर लूट, सुधार के नाम पर दिखावा
सबसे खराब स्थिति बैडमिंटन कोर्ट नंबर 3 की है। जानकारी के मुताबिक़, एक साल में दस बार मरम्मत हो चुकी है और हर बार 20 से 25 हज़ार रुपये खर्च किए गए। विभाग की नज़र में यही कर्तव्य की पूर्ति है। एक नया लकड़ी का कोर्ट महज़ 5 लाख में बन सकता है, लेकिन अब तक मरम्मत के नाम पर करीब दोगुनी राशि बहा दी गई है।
खिलाड़ियों की मानें तो आए दिन चोटिल होना आम बात हो गई है।
पंकज (RT इनकम टैक्स खिलाड़ी) कहते हैं,
“हम शिकायत करते हैं, मगर कोई सुनवाई नहीं होती। लगता है जैसे हमारी मेहनत का कोई मोल ही नहीं।”
एसी जंग खा रहे, कोर्ट में जलभराव
बिजली के उपकरण, खासतौर पर कोर्ट में लगे एसी, अब शो-पीस बन चुके हैं — उन पर जंग की परत चढ़ी है। बरसात में कोर्ट में जलभराव हो जाता है, जिससे खिलाड़ियों का अभ्यास प्रभावित होता है और चोट का खतरा बढ़ जाता है।
मनीष (स्थानीय खिलाड़ी) कहते हैं,
“हर साल नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, लेकिन हमारे स्टेडियम की दशा तो और भी गिरती जा रही है।”
सवाल सिर्फ स्टेडियम का नहीं, नीति और नीयत का है
हर साल “खेलो इंडिया”, “युवा नीति”, “मिशन ओलंपिक” जैसे नारे तो खूब लगाए जाते हैं, करोड़ों का बजट भी पारित होता है, लेकिन लखनऊ जैसे महानगर में यदि एक प्रमुख स्टेडियम की हालत इतनी खराब हो, तो यह विभागीय उदासीनता नहीं तो और क्या है?
सुबह मॉर्निंग वॉक पर आने वाले बुज़ुर्ग कहते हैं:
“अब तो लगता है जैसे स्टेडियम नहीं, कोई भूला-बिसरा खंडहर हो गया हो… प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता।”
लखनऊ की जनता पूछ रही है —
क्यों नहीं स्टेडियम के पुनर्निर्माण की योजना बनाई जाती?
क्यों बार-बार मरम्मत में ही धन बहाया जा रहा है?
किसकी जेब में जा रहा है ये मरम्मत का पैसा?
क्या सिर्फ योजनाएं और नारे ही दिखावा हैं?
अब वक्त है निर्णय का केडी सिंह बाबू स्टेडियम सिर्फ एक ढांचा नहीं, यह हज़ारों युवाओं की उम्मीदों का मैदान है। यदि आज भी इसे उपेक्षित रखा गया, तो आने वाली पीढ़ियां न केवल बेहतर सुविधाओं से वंचित रह जाएंगी, बल्कि “खेलो इंडिया” जैसे अभियानों का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
लखनऊ की आवाज़ बुलंद हो चुकी है
“खेलों को सिर्फ जुमलों में मत सीमित करो, मैदान में भी सुधार लाओ!”
ये भी पढ़ें कांवड़ यात्रा: 11 जुलाई से विशेष तिथियों पर रूट डायवर्जन लागू, भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित












