हरेली की हरियाली में सजी आदिवासी संस्कृति, बच्चों ने बांधा समां
उत्तर बुनियादी सीबीएसई शाला में दिखा लोकपरंपरा का रंग; ढोल-मांदर की थाप पर थिरके विद्यार्थी, ‘जल-जंगल-जमीन’ संरक्षण का दिया संदेश
जिला संवाददाता ताम्रध्वज साहू
बेमेतरा। हरेली की हरियाली और आदिवासी संस्कृति के रंगों ने उत्तर बुनियादी सीबीएसई शाला, बेमेतरा के वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय कर दिया। विद्यालय में हरेली पर्व एवं विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन परंपरा, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ हर्षोल्लास से किया गया। विद्यार्थियों की शानदार प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ। इसके बाद विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों ने पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में ढोल-मांदर की थाप पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किए। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों और लोकनृत्य की प्रस्तुति ने उपस्थित पालकों एवं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
‘जल-जंगल-जमीन’ का संदेश
विद्यार्थियों ने आदिवासी संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और ‘जल-जंगल-जमीन’ के महत्व को केंद्र में रखकर लघु नाटिका एवं भाषण प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से बच्चों ने प्रकृति के संरक्षण और पारंपरिक विरासत को सहेजने का संदेश दिया।
औजारों की पूजा, लोकगीतों पर सांस्कृतिक प्रस्तुति
हरेली पर्व के अवसर पर कृषि में उपयोग होने वाले पारंपरिक औजारों की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। छात्राओं ने पारंपरिक वेशभूषा में हरेली के लोकगीतों पर आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। लोकगीतों की मधुर धुन और पारंपरिक रंगों से विद्यालय परिसर में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली।
‘ऐसे आयोजन बच्चों को जड़ों से जोड़ते हैं’
संस्था प्रमुख थानेश्वर साहू ने कहा कि हरेली पर्व कृषि और प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध को दर्शाता है, जबकि विश्व आदिवासी दिवस हमें अपनी संस्कृति, परंपरा और विरासत से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि विद्यालय में ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में पर्यावरण प्रेम, सांस्कृतिक सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम में पालकों की ओर से दुर्गेश पटेल, सोनिया सिंह, गोपाल साहू एवं रश्मि साहू सहित बड़ी संख्या में पालकगण मौजूद रहे। पालकों ने बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की जमकर सराहना की। हरेली और विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, प्रकृति, परंपरा और विरासत से जुड़ने का जीवंत अवसर बन गया।












