सावन में बकुलाही मैया ने लिया रौद्र रूप, वर्षों बाद गांव-गांव दिखी नदी की धारा
जिला संवाददाता अमित शुक्ला
प्रतापगढ़। सावन मास में हुई लगातार भारी बारिश से जनपद की बकुलाही नदी उफान पर है। रामायण कालीन बकुलाही नदी ने अपनी प्राचीन और नई दोनों जलधाराओं में अथाह पानी के साथ रौद्र रूप धारण कर लिया है। वर्षों बाद नदी को अपने पुराने स्वरूप में देखकर गांव-गांव में लोगों, खासकर बच्चों और युवाओं में उत्साह और खुशी का माहौल है। वहीं दूसरी ओर जलभराव, रास्तों के अवरुद्ध होने और कच्चे मकानों के गिरने से ग्रामीणों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं।
भयहरणनाथ महादेव धाम में बकुलाही नदी का विहंगम दृश्य देखने को मिल रहा है। नदी ने तीन ओर से धाम को घेर लिया है। धाम के पीछे स्थित अति प्राचीन शिव गंगा ताल भी अथाह जल से लबालब भर गया है और अपने प्राचीन स्वरूप की स्वयं गवाही दे रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्षों के प्रयास और 20 सत्याग्रह के बाद यह तालाब अपने अस्तित्व के साथ पुनः सामने आया है।
बकुलाही पुनरोद्धार अभियान के संयोजक एवं भयहरणनाथ धाम के महासचिव समाज शेखर ने बताया कि बकुलाही और भयहरणनाथ क्षेत्र के गांवों से नदी के पुनर्जीवित स्वरूप को लेकर उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। हालांकि अतिक्रमण और अव्यवस्थित निर्माण के कारण कई स्थानों पर जलभराव की स्थिति गंभीर हो गई है।
उन्होंने बताया कि छतौना, शिवरा और हैन्सी में पुलिया से करीब एक मीटर ऊपर पानी बह रहा है। वहीं भटपुरवा में करोड़ों रुपये की लागत से बनाया गया पुल भी जलभराव के कारण अपेक्षित उपयोगी साबित नहीं हो पा रहा है। पुल के दोनों ओर करीब 100-100 मीटर चौड़ी जलधारा बह रही है, जिससे आसपास का क्षेत्र जलमग्न हो गया है।
समाज शेखर ने कहा कि गुरुवार, 20 अगस्त को वह साथियों, कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के साथ भयहरणनाथ धाम क्षेत्र में बकुलाही नदी की प्राचीन धारा का व्यापक भ्रमण करेंगे। इस दौरान बाढ़ की वास्तविक स्थिति का अध्ययन एवं आकलन किया जाएगा। इसके बाद सरकार, समाज और जिला प्रशासन को आवश्यक सुझाव देकर नदी के पुनरोद्धार, जल निकासी और बाढ़ से बचाव के लिए यथोचित प्रयास किए जाएंगे।
भ्रमण के दौरान भयहरणनाथ धाम क्षेत्र के सूर्य मंदिर, ऊंचडीह, शिवरन देवी धाम और गौरा देवी स्थान पर दर्शन-पूजन भी किया जाएगा। बकुलाही के वर्तमान स्वरूप ने एक बार फिर नदी की प्राचीन जलधारा, तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को संरक्षित करने की आवश्यकता को सामने ला दिया है।












