रबी सीज़न में दलहनी फसलों में समेकित सिंचाई एवं कीट प्रबंधन हेतु सलाह को अपनाये
संवाददाता विनय कुमार मिश्रा प्रतापगढ
दिनांक 09 जनवरी 2026 प्रतापगढ़। जिला कृषि अधिकारी अशोक कुमार ने बताया है कि निकटस्थ रबी सीज़न को देखते हुए एवं दलहनी फसलों के महत्व को ध्यान में रखकर, जिला कृषि विभाग आपके लिए दलहनी फसलों में सिंचाई एवं कीट प्रबंधन पर कुछ आवश्यक सलाह लेकर प्रस्तुत है। इनका पालन कर आप उत्पादन लागत कम करते हुए बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। दलहनी फसलें सामान्यतः कम पानी वाली फसलें हैं, परंतु समय पर एवं वैज्ञानिक विधि से सिंचाई करने पर उपज में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। चने को 2 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है – पहली सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद (फूल निकलते समय) एवं दूसरी सिंचाई बुवाई के 55-60 दिन बाद (फलियाँ बनते समय)। यदि नमी कम हो तो तीसरी सिंचाई दाना भरते समय की जा सकती है। सिंचाई हल्की करें। मटर पहली सिंचाई बुवाई के 30 दिन बाद तथा दूसरी फूल एवं फली बनते समय। खरीफ मटर में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। मसूर एक या दो सिंचाइयाँ पर्याप्त हैं। पहली सिंचाई बुवाई के 40-45 दिन बाद तथा दूसरी दाना भरते समय। अलसी आमतौर पर एक सिंचाई (बुवाई के 30-35 दिन बाद) पर्याप्त है। यदि सूखा हो तो फूल आने पर दूसरी सिंचाई दें। सिंचाई की विधि के सम्बन्ध में बताया है कि कोरोना/स्प्रिंकलर विधि अपनाएँ। इससे 30-40 प्रतिशत पानी की बचत होती है और फसल को एकसमान पानी मिलता है। खेत में जल निकासी का उचित प्रबंध करें। जल भराव से फसल को नुकसान हो सकता है। फर्रो (क्यारी) विधि से सिंचाई करना भी लाभकारी है। भूमि में पर्याप्त नमी होने पर बुवाई करें। हल्की सिंचाई को प्राथमिकता दें, अत्यधिक सिंचाई न करें। सिंचाई के बाद खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें।
उन्होने समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) के सम्बन्ध में बताया है कि दलहनी फसलों में कुछ विशेष कीटों का प्रकोप हो सकता है। रासायनिक दवाओं का अन्धाधुन्ध प्रयोग न करते हुए समेकित कीट प्रबंधन अपनाएँ। कटुआ सूंडी/गुलाबी सूंडीः पौधे को जमीनी स्तर से काट देती है। फली छेदक कीटः फलियों में छेद कर दाने को नुकसान पहुँचाते हैं। माहू/एफिडः पत्तियों एवं कोमल तनों का रस चूसते हैं, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है।सफेद मक्खीः पत्तियों के नीचे की ओर रस चूसती है तथा पीला मोज़ेक नामक रोग फैलाती है। नियंत्रण के उपाय के सम्बन्ध में बताया है कि स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का प्रयोग करें, खेत की गहरी जुताई करें ताकि कीटों के अवस्था (प्यूपा) नष्ट हो जाएँ, फसल चक्र अपनाएँ, खेत की सफाई रखें एवं प्रारंभिक अवस्था में ही प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें।। यांत्रिक/भौतिक उपाय के सम्बन्ध में बताया है कि प्रकाश प्रपंच एवं फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करें (प्रति हेक्टेयर 4-5 ट्रैप), पीले चिपचिपे ट्रैप माहू के नियंत्रण में सहायक हैं, हाथ से सूंडियों को इकट्ठा कर नष्ट करें। जैविक उपाय हेतु ट्राइकोग्रामा कार्ड्स का छिड़काव (15,000 प्रति हेक्टेयर) फली छेदक कीट के अंडों को नष्ट करता है।नीम के बीज का अर्क (5 प्रतिशत) या निम्बीसिडीन (0.03 प्रतिशत) का छिड़काव प्रभावी है। बी.टी. (बैसिलस थूरिंजिएन्सिस) या एनपीवी (न्यूक्लियर पॉलीहाइड्रोसिस वायरस) का प्रयोग करें। रासायनिक उपाय हेतु रासायनिक दवाओं का प्रयोग केवल तभी करें जब कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर से ऊपर पहुँच जाए। माहू के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल (0.3 मिली/लीटर), फली छेदक के लिए इंडोक्साकार्ब 14.5 प्रतिशत एससी (0.5 मिली/लीटर) या स्पिनोसेड 45 प्रतिशत एससी (0.3 मिली/लीटर) का प्रयोग कर सकते हैं। कीटनाशक का चयन, मात्रा एवं छिड़काव का समय स्थानीय कृषि अधिकारी/विशेषज्ञ की सलाह से ही करें। छिड़काव शाम के समय करें तथा निर्धारित मात्रा व घोल का ही प्रयोग करें। कीटनाशकों के प्रयोग में सुरक्षा उपकरण (मास्क, दस्ताने आदि) अवश्य पहनें। अपनी फसल की नियमित निगरानी करते रहें। किसी भी समस्या के समाधान हेतु निकटस्थ कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि अधिकारी या कृषि सहायक से संपर्क करें। आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर हम दलहन उत्पादन में वृद्धि कर आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में योगदान दे सकते हैं। किसी भी जानकारी के लिये जिला कृषि अधिकारी कार्यालय विकास भवन कमरा नम्बर-20 में सम्पर्क कर सकते है।
जिला सूचना कार्यालय प्रतापगढ़ द्वारा प्रसारित












