ईदगाह मोहल्ला स्थित ईदगाह मस्जिद में हर्षोल्लास के साथ अदा की गई ईद-उल-अजहा की नमाज
संवाददाता दैनिक चक्र: रोहतास के शहर डेहरी ऑन सोन: आज डेहरी की सरजमीं एक ऐसी रूहानी मंजर की गवाह बनी, जिसे मुद्दतों तक याद रखा जाएगा। ईदगाह मोहल्ला स्थित शाही ईदगाह मस्जिद में ईद-उल-अजहा की नमाज के मौके पर श्रद्धा और अकीदत का वह समंदर उमड़ा, जिसने अनुशासन और भाईचारे की एक नई इबारत लिख दी। सफेद कुर्ते-पाजामे और इत्र की खुशबू में बसे हजारों अकीदतमंदों ने जब एक साथ ‘अल्लाह-हु-अकबर’ की सदा बुलंद की, तो ऐसा लगा मानो पूरी कायनात इस इबादत में शामिल हो गई हो।
इबादत का वह नूरानी मंजर:
सूरज की पहली किरण के साथ ही शहर के हर कूचे से नमाजियों का सैलाब ईदगाह की ओर उमड़ पड़ा था। देखते ही देखते ईदगाह की विशाल प्राचीरें छोटी पड़ गईं और अकीदतमंदों की कतारें दूर सड़कों तक जा पहुंचीं। खुदा की बारगाह में अमीर-गरीब और छोटे-बड़े का फर्क मिट गया; हर शख्स सिर्फ एक इबादतगुजार बनकर कतार में खड़ा था। इमाम हाफ़िज़ अलाउद्दीन साहब की बुलंद आवाज पर जब हजारों सर एक साथ सजदे में गिरे, तो वह मंजर अनुशासन और समर्पण की पराकाष्ठा था।
खुतबे में इंसानियत का संदेश:
नमाज के बाद इमाम हाफ़िज़ अलाउद्दीन साहब ने अपने ओजस्वी ‘खुतबे’ में हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की अजीम कुर्बानी का जिक्र करते हुए कहा कि, “कुर्बानी का असली मकसद जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि इंसान के भीतर छिपी नफरत, लालच और बुराइयों की कुर्बानी देना है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस्लाम हमें पड़ोसी के अधिकारों और मजलूमों की मदद का सबक सिखाता है।
दुआओं के लिए उठे हजारों हाथ, नम हुईं आंखें:
मंजर सबसे भावुक तब हुआ जब सामूहिक दुआ का वक्त आया। हजारों हाथों ने जब आसमान की ओर रुख किया, तो हर आंख खुदा के खौफ और उसकी रहमत की उम्मीद में नम थी। मुल्क की सरहदों की हिफाजत, कौमी एकता की मजबूती, और डेहरी की मिट्टी में हमेशा प्यार-मोहब्बत की खुशबू महकती रहे—इसके लिए विशेष दुआएं मांगी गईं।
प्रशासनिक मुस्तैदी और बेमिसाल इंतजाम:
इतने बड़े जनसमूह को संभालने के लिए मस्जिद कमेटी और स्थानीय प्रशासन का तालमेल ‘केस स्टडी’ जैसा था। ड्रोन कैमरों से लेकर चप्पे-चप्पे पर तैनात सुरक्षाबलों और मुस्तैद वालंटियर्स ने यह सुनिश्चित किया कि परिंदा भी पर न मार सके।
साझा संस्कृति की अनुपम मिसाल:
ईदगाह के बाहर का दृश्य गंगा-जमुनी तहजीब का जीता-जागता उदाहरण था। नमाज के बाद हिंदू-मुस्लिम भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाकर यह संदेश दिया कि मजहब जोड़ने का नाम है, तोड़ने का नहीं। छोटे बच्चों की चहक और बड़ों के चेहरों पर सुकून की मुस्कान ने इस त्योहार की रौनकों में चार चांद लगा दिए।
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