ज़लालत इश्क ने दी थी

ज़लालत इश्क ने दी थी वो वापस उसको देनी है

हूँ बैठा ताक में उसकी लगी मुझको बे-चैनी है

यहां तक़ता पलट डाला मेरी ग़ज़लो के शेरों ने

ख़ुदा का शुक्र करता हूँ दिखाई उसने रैनी है

तवायफ ही नहीं दुनियां में, जो तोड़े नशेमन को,

हैं कुछ कमज़र्फ चेहरे भी, निगाहें जिनकी पैनी हैं

  • कबीर हालाती शायर…

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