माँ भगवती की शरण में राजा भइया का शस्त्र पूजन शास्त्र सम्मत-दिव्य अग्रवाल

माँ भगवती की शरण में राजा भइया का शस्त्र पूजन शास्त्र सम्मत-दिव्य अग्रवाल

सनातन परंपरा में शक्ति और शस्त्र का अटूट संबंध—धर्म रक्षा का प्रतीक

संवाददाता अवधेश चंद्र पांडेय

कुंडा, प्रतापगढ़। शिव की अर्धांगिनी शक्ति, जिन्हें सनातनी समाज देवी भगवती के रूप में पूजता है, शस्त्र को अपना स्वरूप मानते हुए धर्म रक्षा की प्रेरणा देती हैं। दुर्गा सप्तशती और अन्य धर्मग्रंथों में देवी के हाथों में शोभायमान शस्त्रों का उल्लेख किया गया है, जो यह प्रमाणित करते हैं कि शक्ति और शस्त्र एक दूसरे के पूरक हैं।दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में महाकाली के स्वरूप का वर्णन है, जिसमें उनके दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, धनुष, शूल और अन्य शस्त्रों का उल्लेख है। नारायणी स्तुति और शूल-गदा स्तुति में देवी से उनके शस्त्रों के माध्यम से रक्षा की प्रार्थना की गई है। जैसे शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।हे देवी! आप अपने त्रिशूल और खड्ग से हमारी रक्षा करें।
सनातन धर्म में कहा गया है कि जिस प्रकार स्त्री का श्रृंगार स्वर्ण और रजत आभूषण के बिना अधूरा होता है, उसी प्रकार सामर्थ्यवान पुरुष का पौरुष शस्त्र के बिना अपूर्ण है। देवी भगवती को शस्त्र अर्पित करना और उसका पूजन करना सनातन परंपरा में शास्त्र सम्मत है। जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व कैबिनेट मंत्री कुंडा विधायक कुंवर रघुराज प्रताप सिंह राजा भइया ने माँ शारदा के चरणों में अपने वैधानिक शस्त्र का पूजन किया। यह कृत्य सनातन धर्म और शास्त्रों के अनुरूप है। लोकतंत्र में वैधानिक प्रक्रिया का पालन करके शस्त्र रखने की अनुमति होती है, और उस शस्त्र का पूजन करना किसी भी प्रकार से असंवैधानिक नहीं है।धर्मग्रंथों के अनुसार, धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र और शक्ति का मेल आवश्यक है। देवी भगवती उन धर्म प्रहरियों पर विशेष कृपा करती हैं, जो मानवता की रक्षा हेतु वैधानिक शस्त्र धारण करते हैं। अधर्म और विधर्मियों का नाश बिना शक्ति और शस्त्र के संभव नहीं है।राजा भइया का यह शस्त्र पूजन सनातन धर्म की परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप है। यह कृत्य धर्म और शक्ति की रक्षा का प्रतीक है। सनातनी समाज में यह परंपरा शक्ति और शस्त्र के अटूट संबंध को दर्शाती है।

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