CG: दवा-खाद्य जांच के नाम पर दिखावा? बेमेतरा में कार्रवाई से ज्यादा प्रचार पर उठे सवाल”

दवा-खाद्य जांच के नाम पर दिखावा? बेमेतरा में कार्रवाई से ज्यादा प्रचार पर उठे सवाल”

“सही दवा-शुद्ध आहार” अभियान के बीच बाजार में खुलेआम बिक रहे एक्सपायर्ड सामान, जनता पूछ रही— आखिर जिम्मेदार कौन?

जिला संवाददाता ताम्रध्वज साहू बेमेतरा, प्रदेश सरकार द्वारा चलाए जा रहे 15 दिवसीय विशेष अभियान “सही दवा-शुद्ध आहार, यही छत्तीसगढ़ का आधार” के तहत बेमेतरा जिले में खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टीम लगातार निरीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चला रही है। लेकिन दूसरी ओर जिले के कई हिस्सों में अब भी एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री, खुले में बिक रहे खाद्य पदार्थ, बिना मानक के संचालित मेडिकल स्टोर और अस्वच्छ होटल-ढाबों की स्थिति प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

सूत्रों के अनुसार जिले में वर्षों से कई किराना दुकानों, चाट-गुपचुप सेंटरों और छोटे होटलों में बिना गुणवत्ता जांच के खाद्य सामग्री बेची जा रही है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में कई मेडिकल दुकानों में बिना फार्मासिस्ट के दवाइयों की बिक्री होने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। इसके बावजूद अभियान के दौरान केवल “नमूना जांच” और “निर्देश” तक सीमित कार्रवाई होने से आम लोगों में नाराजगी दिखाई दे रही है।

जानकारों का कहना है कि यदि विभाग वास्तव में सख्ती से जांच करे तो कई प्रतिष्ठानों के लाइसेंस रद्द होने की नौबत आ सकती है। जिले के उपभोक्ताओं का आरोप है कि त्योहारों और विशेष अभियानों के दौरान ही निरीक्षण की औपचारिकता निभाई जाती है, जबकि सामान्य दिनों में खाद्य सुरक्षा और दवा गुणवत्ता की निगरानी लगभग गायब रहती है।

अभियान के दौरान छह खाद्य नमूने लेकर प्रयोगशाला भेजे जाने की जानकारी दी गई है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जिलेभर में हजारों खाद्य प्रतिष्ठानों के बीच केवल कुछ नमूने लेना क्या पर्याप्त कार्रवाई मानी जा सकती है? लोगों का कहना है कि जब तक दोषी दुकानदारों पर सार्वजनिक रूप से जुर्माना, लाइसेंस निलंबन और कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे अभियान केवल कागजी साबित होंगे।

फल दुकानों और कोल्ड स्टोरेज में निरीक्षण कर सड़े-गले फलों की छंटाई कराने के निर्देश दिए गए, लेकिन शहर और ग्रामीण बाजारों में अब भी खुलेआम खराब फल और कृत्रिम रूप से पकाए गए फलों की बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं। आम नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन वास्तव में गंभीर है तो नियमित जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा जागरूकता कार्यक्रमों में नशीली दवाओं, एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस और खाद्य सुरक्षा की जानकारी दी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई क्षेत्रों में बिना डॉक्टर पर्चे के दवाइयां आसानी से उपलब्ध हैं। इससे युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या “सही दवा-शुद्ध आहार” अभियान वास्तव में जनता की सुरक्षा के लिए है, या फिर यह केवल सरकारी फाइलों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित एक औपचारिक अभियान बनकर रह जाएगा?

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