उज्जैन की ऐतिहासिक पहचान ‘टंकी चौक’ की लोहे की पानी की टंकी अब इतिहास बनने की कगार पर

उज्जैन की ऐतिहासिक पहचान ‘टंकी चौक’ की लोहे की पानी की टंकी अब इतिहास बनने की कगार पर

110 साल पुरानी विरासत को अलविदा कहने की तैयारी, विकास की दौड़ में खोती जा रही शहर की पहचान

संवाददाता: संतोष यादव, उज्जैन

मध्यप्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक शहर उज्जैन की एक और अनमोल धरोहर अब धीरे-धीरे इतिहास बनने जा रही है। गोपाल मंदिर क्षेत्र में स्थित लोहे की प्रसिद्ध पानी की टंकी, जिसे कभी ‘टंकी चौक’ के नाम से जाना जाता था, अब आने वाले समय में शहर के नक्शे से गायब हो सकती है। समय के साथ कई यादें इतिहास बन जाती हैं, और आज हम बात कर रहे हैं उसी ऐतिहासिक टंकी चौक की, जो कभी उज्जैन की जीवनरेखा हुआ करती थी। अंग्रेजों के दौर में लगभग 110 साल पहले इस टंकी का निर्माण बेहद मजबूत और आधुनिक तकनीक से किया गया था। इसकी तुलना उस समय की बड़ी संरचनाओं से की जाती थी, जैसे हावड़ा ब्रिज, जो अपनी मजबूती और इंजीनियरिंग के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस टंकी के आधार में मोटी तांबे की मजबूत प्लेट लगाई गई थी, जबकि इसका लोहा जंगरोधी धातुओं से निर्मित था। यही कारण है कि एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस पर जंग का कोई खास असर देखने को नहीं मिलता और यह आज भी अपनी मूल अवस्था में खड़ी नजर आती है। इस टंकी से निकली विशाल पाइपलाइनें छत्री चौक और बड़ा सराफा तक फैली हुई थीं। इन पाइपों से जुड़े पीतल के बड़े आउटलेट पंपों के माध्यम से नगर पालिका के कर्मचारी रोजाना सड़कों की धुलाई करते थे। उस समय की स्वच्छता व्यवस्था और कर्मचारियों की ईमानदारी आज भी लोगों के लिए एक मिसाल बनी हुई है। यह टंकी सिर्फ पानी की व्यवस्था का साधन ही नहीं थी, बल्कि सामाजिक जीवन का भी केंद्र थी। इसकी छांव में लोग बैठकर समय बिताते थे, वहीं पक्षियों की चहचहाहट इस स्थान को जीवंत बनाए रखती थी। बताया जाता है कि इसी स्थान के नीचे नागदा, बड़नगर और रतलाम जाने वाली बसों का बस स्टैंड भी हुआ करता था, जो बाद में अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया। 1947 के भारत का विभाजन के बाद बदले सामाजिक और आर्थिक परिवेश में इस क्षेत्र का स्वरूप भी बदलता गया। समय के साथ टंकी जर्जर होने लगी और सुरक्षा कारणों से इसका उपयोग बंद कर दिया गया। आज जब उज्जैन नए विकास और आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तब यह ऐतिहासिक टंकी भी चुपचाप शहर को अलविदा कहने की तैयारी में है। यह केवल एक संरचना नहीं, बल्कि उज्जैन की विरासत, संस्कृति और पुरानी यादों का जीवंत प्रतीक रही है।
अब सवाल यह है कि क्या विकास की इस दौड़ में हम अपनी ऐतिहासिक पहचान को यूं ही खोते रहेंगे, या फिर इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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