कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक ने जल संचयन की परियोजनाओं का किया अवलोकन

कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक ने जल संचयन की परियोजनाओं का किया अवलोकन

संवाददाता अनिल कुशवाहा 

टहरौली ( झांसी ) उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार), लखनऊ के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने झांसी जनपद के 40 गाँवों में संचालित इक्रीसेट की टहरौली परियोजना का दौरा किया। इस टीम का नेतृत्व डॉ. संजय सिंह, महानिदेशक ने किया। उनके साथ डॉ. परमेंद्र सिंह (उप महानिदेशक, कृषि अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण), डॉ. राजर्षि कुमार गौड़ (उप महानिदेशक, अनुसंधान), डॉ. अभिजीत गौतम और डॉ. हिमांशु तिवारी (तकनीकी सचिव) शामिल थे।

 

इस दौरे का मुख्य उद्देश्य यह आकलन करना था कि परियोजना के तहत टहरौली तहसील के चयनित गाँवों में 28000 हेक्टेयर क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण कैसे संभव हुआ है, तथा इस सफल मॉडल को उत्तर प्रदेश के अन्य शुष्क और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किस प्रकार दोहराया जा सकता है।

 

प्रतिनिधिमंडल ने कई परियोजना स्थलों का अवलोकन किया। नोटा गाँव में उन्होंने परियोजना के तहत विकसित सामुदायिक तालाब का निरीक्षण किया और किसानों से इसके लाभों पर चर्चा की। साथ ही उन्होंने कृषिवानिकी मॉडल भी देखे, जो फसल प्रणाली के विविधीकरण और फसल विफलता के जोखिम को कम करने के लिए विकसित किए गए हैं।

 

गुंदाहा गाँव में, इक्रीसेट के प्रधान वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश सिंह ने बताया कि किस प्रकार परियोजना के क्रियाकलापों से पशुओं के लिए जल संकट को दूर किया जा रहा है।

 

भदोखर गाँव में प्रतिनिधिमंडल ने एक पारंपरिक हवेली वर्षा जल संचयन संरचना देखी, जिसे वैज्ञानिक जल-वैज्ञानिक (हाइड्रोलॉजिकल) प्रथाओं के साथ एकीकृत किया गया है। इससे खेती की उत्पादकता और किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यहाँ उन्होंने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन समिति (टहरौली), प्रोग्रेसिव बुंदेलखंड किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और स्थानीय किसानों से भी संवाद किया। किसानों ने अपने अनुभव साझा किए कि कैसे इक्रीसेट द्वारा संचालित परियोजना ने उनकी जीविकोपार्जन क्षमता को सुदृढ़ किया और सूखा-प्रतिरोधकता बढ़ाई।

 

डॉ. संजय सिंह ने किसानों को सलाह दी कि वे खरीफ एवं रबी फसलों की शीघ्र परिपक्व होने वाली किस्में अपनाएँ, जिससे बदलते जलवायु परिस्थितियों में बेहतर आय प्राप्त की जा सके। पोस्टर प्रदर्शनियों के माध्यम से यह भी दर्शाया गया कि किस प्रकार वर्षा जल संचयन ने परती भूमि को उत्पादक कृषि भूमि में बदल दिया है।

 

डॉ. अशोक शुक्ला, सहयोगी वैज्ञानिक, ने किसानों को टाइम डोमेन रिफ्लेक्टोमेट्री (TDR), स्वचालित मौसम स्टेशन (AWS) और DIVERs जैसे उन्नत यंत्रों का प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि इन उपकरणों से फसलों की जल आवश्यकताओं का आकलन करने के साथ-साथ कृषिवनिकी प्रणालियों में वृक्षों और फसलों के बीच नमी प्रतिस्पर्धा का भी अध्ययन किया जा रहा है।

 

इस अवसर पर इक्रीसेट के अन्य प्रतिनिधि सुनील कुमार निरंजन, इं. आनंद कुमार सिंह, इं. दीपक त्रिपाठी, विजय सिंह, इं. ललित, शैलेंद्र सोनी, सतेंद्र राणा, राकेश कुमार और अनिल सिंह सहित सहायक स्टाफ भी उपस्थित थे।

 

उपकार के अधिकारियों ने इक्रीसेट के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि टहरौली परियोजना सतत जल प्रबंधन, फसल एवं कृषिवनिकी आधारित विविधीकरण और ग्रामीण आजीविका सुधार का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने इस मॉडल को उत्तर प्रदेश के अन्य सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि कृषि की स्थिरता और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित की जा सके। इस मौके पर प्राकृतिक संसाधन संरक्षण समिति के अध्यक्ष आशीष उपाध्याय, रामप्रकाश पटेल, पुष्पेन्द्र सिंह बुंदेला, इन्द्रपाल सिंह बुंदेला, छायाकार पिंटू, महेश वर्मा, गौरव यादव, मुन्ना लाल उपाध्याय, प्रह्लाद पटेल आदि भी उपस्थित रहे।

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