किसान परेशान, सुबह चार बजे से रात तक लाइन, फिर भी नहीं मिल रही खाद

यूरिया के लिए किसान परेशान, सुबह चार बजे से रात तक लाइन, फिर भी नहीं मिल रही खाद

जिला संवादाता काव्यांश रावत .एटा। खरीफ हो या रबी, हर बार किसान को खाद के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इन दिनों यूरिया की भारी किल्लत के चलते किसान सुबह चार बजे से लेकर देर रात तक लाइन में लगे रहने को मजबूर हैं। इसके बावजूद भी उन्हें एक-एक बोरी यूरिया के लिए मोहताज होना पड़ रहा है।

किसानों ने अपनी व्यथा “बोले एटा” के संवाददाता के सामने साझा की। हीरापुर निवासी नन्नू सिंह का कहना है, “सुबह चार बजे घर से निकलते हैं, फिर भी कोई गारंटी नहीं कि खाद मिल ही जाए।” नगला भजुआ के बिजेंद्र ने सरकार की उदासीनता पर सवाल उठाए कि जब जरूरत है तो खाद का उत्पादन समय पर क्यों नहीं किया जाता।

कई किसान यूरिया के लिए सुबह 4 बजे से रात 9 बजे तक लाइन में रहते हैं।

स्टोर पर पहुंचने के बाद खाद खत्म होने की सूचना मिलती है।

दूसरे स्टोर पर जाने पर सैकड़ों की भीड़ पहले से खड़ी मिलती है।

किसानों को खाद के साथ जबरदस्ती लगेज (बोतल या अन्य सामग्री) दी जा रही है, जिसकी कीमत भी देनी पड़ती है।

कई जगहों पर पुलिस की मौजूदगी में ही वितरण व्यवस्था सुचारू हो पाती है।

किसान दिन भर भटकने के बाद भूखे-प्यासे खाली हाथ लौट जाते हैं।

किशनगढ़ निवासी सुमित कुमार का कहना है कि “ऐसा लगता है कि किसान को अभी भी आजादी नहीं मिली। उसे जब अपनी जरूरी चीजें नहीं मिल रही हैं तो कैसी आजादी?”

मंशुखपुर के गुड्डू बोले, “हर सरकार कहती है कि किसानों को राहत देंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कोई देखने को तैयार नहीं।” वहीं, नगला धनू के गौरव ने कहा, “वोट मांगने के समय नेता आते हैं, लेकिन आज जब किसान आठ घंटे लाइन में है, तो कोई नहीं पूछता कि क्या दिक्कत है।”

किसानों की मांग:

खाद का समय पर उत्पादन और वितरण सुनिश्चित किया जाए।

लगेज के नाम पर अनावश्यक बोझ बंद हो।

अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करना चाहिए।

खाद वितरण में पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी होनी चाहिए।

यूरिया और डीएपी की किल्लत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सरकार के आंकड़े और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर है। किसान, जो देश की रीढ़ हैं, आज भी खाद जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जरूरत है कि इस विषय को प्राथमिकता दी जाए, नहीं तो फसल और किसान—दोनों ही संकट में रहेंगे।

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