ऑपरेशन मुस्कान बना उम्मीद की किरण, अनगिनत बच्चों के चेहरों पर लौटी मुस्कान

ऑपरेशन मुस्कान बना उम्मीद की किरण, अनगिनत बच्चों के चेहरों पर लौटी मुस्कान

संवाददाता: सायरा सूर्यवंशी. गाजियाबाद।
लापता, शोषित और संकटग्रस्त बच्चों के जीवन में नई रोशनी लाने वाला ऑपरेशन मुस्कान आज दयालु पुलिसिंग और सामाजिक न्याय का सशक्त प्रतीक बन चुका है। इस अभियान के माध्यम से न केवल हजारों बच्चों को शोषण के दलदल से बाहर निकाला गया, बल्कि उन्हें सुरक्षित भविष्य की ओर भी अग्रसर किया गया।

ऑपरेशन मुस्कान (जिसे ऑपरेशन स्माइल भी कहा जाता है) की शुरुआत वर्ष 2014 में गाजियाबाद पुलिस द्वारा एक ट्रायल पहल के रूप में की गई थी। इसकी सफलता को देखते हुए जुलाई 2015 में गृह मंत्रालय द्वारा इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया। अभियान का मुख्य उद्देश्य लापता, भागे हुए, तस्करी या शोषण का शिकार बच्चों को बचाकर उनकी सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करना है।

यह मिशन POCSO अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत संचालित होता है, जिसमें राज्य पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल (RPF), यूनिसेफ-समर्थित नेटवर्क, बाल कल्याण विभाग, चाइल्डलाइन एवं विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों का समन्वित सहयोग रहता है। ऑपरेशन मुस्कान-III, XI सहित कई चरणों में अब तक लाखों बच्चों को सुरक्षित निकाला जा चुका है

अभियान के तहत रेलवे स्टेशन, बाजार, होटल-ढाबे, फैक्ट्रियां, ईंट-भट्टे, ट्रैफिक सिग्नल, निर्माण स्थल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सघन तलाशी अभियान चलाए जाते हैं। बचाए गए बच्चों की काउंसलिंग कर उनकी पृष्ठभूमि समझी जाती है और तत्पश्चात उन्हें बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष प्रस्तुत कर परिवार से पुनर्मिलन या शेल्टर होम में पुनर्वास की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

ऑपरेशन मुस्कान में पुलिस की भूमिका केवल कानून प्रवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बच्चों के अधिकारों की संरक्षक के रूप में भी सामने आती है। विशेष किशोर पुलिस इकाइयाँ (SJPU) और प्रशिक्षित अधिकारी पूरी संवेदनशीलता के साथ कार्य करते हैं। साथ ही DCPU, NGOs, सामाजिक कार्यकर्ता, श्रम विभाग जैसे कई हितधारक मिलकर बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और भावनात्मक सहयोग उपलब्ध कराते हैं।

इस अभियान को किशोर न्याय अधिनियम-2015, बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम-1986, POCSO अधिनियम-2012 और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-1956 जैसे मजबूत कानूनी ढांचे का समर्थन प्राप्त है, जिससे अपराधियों पर कठोर कार्रवाई संभव हो पाती है।

हालांकि पुनर्वास सुविधाओं की कमी, काउंसलरों का अभाव, कुछ क्षेत्रों में बाल श्रम की सामाजिक स्वीकार्यता और दस्तावेज-रहित पलायन जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। इसके बावजूद निरंतर अभियान, तकनीकी-आधारित डाटाबेस, सामुदायिक भागीदारी और सशक्त पुनर्वास व्यवस्था से इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास जारी है।

निष्कर्षतः, ऑपरेशन मुस्कान न केवल बच्चों को बचाने का अभियान है, बल्कि यह मानवता, करुणा और जिम्मेदार पुलिसिंग का जीवंत उदाहरण बनकर अनगिनत बच्चों के चेहरे पर फिर से “मुस्कान” लौटा रहा है।


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